27 जून 2013

कौन था (?) मुल्ला नसीरुद्दीन





समकालीन सरोकार, मई-जून २०१३ 

कौन था (?) मुल्ला नसीरुद्दीन
                          
                         विनोद तिवारी

मुल्ला नसरुद्दीन एक शाम अपने घर से निकला | उसने सोचा कि चलो आज अपने दो-चार मित्रों के घर चला जाय और उनसे भेंट-मुलाकात की जाय | वह अभी घर से निकलकर कुछ ही कदम चला था कि दूसरे गाँव से उसका एक दोस्त जलाल आते हुए दिखा | जलाल जब पास आया तो उसने कहा कि मैं तो तुमसे ही मिलने आ रहा था तुम कहाँ जा रहे हो | नसरुद्दीन ने कहा, तुम घर चलो, मैं जरूरी काम से अपने दो-तीन मित्रों से मिलने जा रहा हूँ और थोड़ी देर में लौटकर आता हूँ | फिर मुल्ला को पता नहीं क्या सूझा कि उसने जलाल से पूछा कि, अगर तुम थके न हो तो मेरे साथ तुम भी चल सकते हो | जलाल ने कहा, मेरे कपड़े सब धूल-मिट्टी से सन गए हैं अगर तुम मुझे अपने कपड़े दे दो तो मैं तुम्हारे साथ चल सकता हूँ | तुम्हारे बगैर यहां बैठकर मैं क्या करूंगा? इसी बहाने मैं भी तुम्हारे मित्रों से मिल लूँगा | नसरुद्दीन लौट कर घर आया और उसने अपने सबसे अच्छे कपड़े जलाल को दे दिए | जलाल तैयार हुआ फिर वे दोनों साथ निकल पड़े |
जिस पहले घर वे दोनों पहुंचे वहां नसरुद्दीन ने कहा, मैं इनसे आपका परिचय करा दूं, ये हैं मेरे दोस्त जलाल और जो कपड़े इन्होंने पहने हैं वे मेरे हैं | जलाल यह सुनकर बहुत हैरान हुआ | इस सच को कहने की कोई भी जरुरत न थी | बाहर निकलते ही जलाल ने कहा, कैसी बात करते हो नसरुद्दीन ! वहाँ अपने मित्र के सामने कपड़ों की बात उठाने की क्या जरूरत थी? अब देखो, दूसरे घर में कपड़ों की कोई बात मत उठाना | वे दूसरे घर पहुंचे | नसरुद्दीन ने कहा, इनसे परिचय करा दूं ये हैं मेरे पुराने मित्र जलाल; रही कपड़ों की बात, सो इनके ही हैं, मेरे नहीं हैं | जलाल फिर हैरान हुआ | बाहर निकलकर उसने कहा, तुम्हें हो क्या गया है? इस बात को उठाने की क्या जरूरत थी कि कपड़े किसके हैं? और यह कहना भी कि इनके ही हैं, शक पैदा करता है, तुम ऐसा क्यों कर रहे हो? मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा, मुझे माफ करो मित्र ! दरअसल में मैं मुश्किल में पड़ गया था वह पहली बार वाली बात मेरे मन में गूंजती रह गई, उसी की प्रतिक्रिया हो गई | मैंने सोचा कि जो पहली बार में गलती हो गई थी उसको सुधार लूं | इसलिए, मैंने कहा कि कपड़े इन्हीं के हैं मेरे नहीं | जलाल ने कहा, अब ध्यान रखना कि इसकी बात ही न उठे यह बात यहीं खत्म हो जानी चाहिए | वे तीसरे मित्र के घर पहुंचे | नसरुद्दीन ने कहा, ये हैं मेरे दोस्त जलाल दूर गाँव से आये हैं रही कपड़ों की बात, सो उठाना उचित नहीं है | क्यों जलाल ठीक है न, कपड़ों की बात उठाने की कोई ज़रुरत ही नहीं है | कपड़े किसी के भी हों, उससे क्या लेना देना | मेरे हों या इनके हों कपड़ों की बात यहाँ उठाने का कोई मतलब ही नहीं है | बाहर निकलकर जलाल ने कहा, अब मैं तुम्हारे साथ और किसी के घर नहीं जा सकूंगा | मैं हैरान हूं, तुम्हें हो क्या गया है | नसरुद्दीन बोला, दोस्त ! मैं अपने ही जाल में फंस गया हूं | मेरे भीतर जो मेरा मैंजम कर बैठा है यह उसी की प्रतिक्रियाएं हुई चली जा रही हैं | मैंने सोचा कि शुरू में दोनों बातें भूल से हो गयीं, कि मैंने अपना कहा और फिर तुम्हारा कहा तो मैंने तय किया कि अब मुझे कुछ भी नहीं कहना चाहिए, यही सोचकर भीतर गया था | अंदर पहुँच कर बार-बार मैं अपने को समझा रहा था कि यहाँ कपड़ों की बात करना बिलकुल ठीक नहीं है और उन दोनों की प्रतिक्रिया यह हुई कि मेरे मुंह से यह निकल गया और जब निकल गया तो समझाना जरूरी हो गया कि कपड़े किसी के भी हों, क्या लेना-देना | 
दरअसल, मुल्ला के ये मित्र जलाल ऐसे मित्र थे जो हर बात में मैं यह करता हूँ, मैं वह करता हूँ, मैंने उसे आज खूब उल्लू बनाया, आदि-आदि |’ मैं, मैं, मैं | जलाल अपने मम`’ से कभी बाहर आता ही नहीं था | साथ ही मुल्ला नसीरुद्दीन की प्रसिद्धि और यश से अंदर ही अंदर कुढता था | मुल्ला ने मौका पाते ही जलाल को यह आभास करा दिया कि मैंक्या है | हम सबके अंदर जो एक मैंबैठा है वह हमेशा दूसरे के अपमान में ही अपनी तुष्टि पाता है | भले ही वह गलत हो | हम उस गलत को ही सही बनाने और प्रमाणित करने के लिए तमाम तर्क-वितर्क करते चले जाते हैं | मुल्ला नसीरूदीन के नाम से ऐसे न जाने कितने हज़ारों-हज़ार किस्से-कहानियाँ, चुटकुले, हाज़िर-जवाब उक्तियाँ दुनिया भर के लोकाख्यानों में प्रचलित हैं | मुल्ला नसीरुद्दीन आज केवल एक संज्ञा भर नहीं है वह अब एक चरित है | मिथ में बदल चुका एक ऐसा विटी और हाजिर-जवाब, परिहास और बुद्धि-चातुर्य से लबरेज चरित जिसके नाम से दुनिया भर में  किस्से-कहानियाँ, चुटकुले, मजाक गढ़ कर सुने सुनाये जाते हैं | मुल्ला नसीरूद्दीन कोई एक नहीं है अलग-अलग देशों के अलग-अलग मुल्ला नसीरुद्दीन हैं | यह रूढ़ हो चुकी एक ऐसी संज्ञा है जिसे भिन्न-भिन्न देशों में ऐसे किस्से कहानियों और चुटकुलों के लिए प्रयोग में लाया जाता है | अरब, ईरान, हिन्दुस्तान, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, तुर्की, योरोप, चीन आदि देशों में मुल्ला नसीरूद्दीन थोड़े बहुत नाम के हेर-फेर से प्रचलित है | अरब, ईरान, हिन्दुस्तान, पाकिस्तान, अफगानिस्तान में यह मुल्ला नसीरुद्दीन है तो योरोपीय देशों और चीन में यह एफेन्दी या अफेंदम के नाम से मशहूर है | तुर्की में यह नाम नसीरुद्दीन होद्ज़ा है |
दरअसल, यह देश-काल की सीमाओं और इतिहास-भूगोल की लकीरों और प्रमाणों से पार विभिन्न संस्कृतियों की आवाजाही और घुलन-मिलन से निर्मित लोक-चित्त में गहरे पसरे वाचिक परम्पराओं का एक ऐसा सच है जिसे किसी प्रमाणकी दरकार नहीं | इसको ठीक इस तरह भी समझा जा सकता है जैसे भारत में व्यासोंकी परम्परा आज भी मौजूद है | पर व्यास तो एक ही हुए महाभारत के रचयिता | पर, क्या व्यास की तरह मुल्ला नसीरुद्दीन भी एक मिथकीय चरित्र था/है ? नहीं मुल्ला नसीरुद्दीन मिथकीय चरित नहीं था | तो फिर कौन था मुल्ला नसीरूदीन ? अलग-अलग दावेदारियाँ हैं कोई मानता है की मुल्ला हमारे हैं तो कोई कहता है मुल्ला हमारे हैं | हिन्दुस्तान में भी मुल्ला नसीरुद्दीन को लेकर यही दावेदारी है कि मुल्ला हमारे हैं | जब मैं तुर्की आया तो पता लगा कि, मुल्ला नसीरुद्दीन पैदायशी तुर्क थे | जहाँ वे पैदा हुए उस गांव का भी उल्लेख किया गया | यह भी बताया गया कि हर साल जुलाई के महीने में वहाँ पर मुल्ला नसीरुद्दीन के नाम से मेला लगता है जिसमें भिन्न-भिन्न तरह के लोक-संस्कृति और लोक-साहित्य से सम्बंधित आयोजन होते हैं | हिन्दुस्तान में मुल्ला नसीरुद्दीन के किस्से पढ़ा था | अपनी हाज़िर-ज़वाबी और तर्क-शक्ति के नाते वे किस्से बहुत पसंद आये थे | यहाँ, तुर्की में एक किताब हाथ लगी- वन्स देयर वाज ट्वाइस देयर वाज नॉट : फिफ्टी टर्किश फोकटेल ऑफ़ नसीरुद्दीन होद्जा | माइकल शेल्टन द्वारा लिखित इस पुस्तक में एक प्रामाणिक भूमिका के साथ मुल्ला नसीरुद्दीन की पचास तुर्की लोककथाओं का तुर्की से अंग्रेजी में अनुवाद किया गया है | माइकल शेल्टन पिछले बारह वर्षों से अपनी पत्नी जोयान के साथ तुर्की में रह रहे हैं | वे एक फ्रीलान्सलेखक और पत्रकार हैं | तुर्की संस्कृति और उसके ऐतिहासिक महत्त्व से बेहद प्रभावित | उन्होंने छह तुर्की लड़कियों को गोद लिया है | तुर्की संस्कृति के महत्व को जानने समझने के क्रम में ही वे मुल्ला नासीरुद्दीन के करीब पहुंचे | इस पुस्तक के पढ़ने के बाद मन मचलने लगा कि मुल्ला के गाँव चला जाय | ‘शिवरीहिसारमुल्ला के गाँव का नाम है जहाँ मुल्ला नसीरूदीन तेरहवीं शताब्दी में पैदा हुए थे | यह कोय (तुर्की में गाँव को कोय खाते हैं) अंकारा और एस्कीशेहिरके बीच में पड़ता है | अंकारा से लगभग ४५ किलोमीटर दूर | यह हिस्सा मध्य अनातोलिया का पुराना हिस्सा है | तेरहवीं शताब्दी में यहाँ तामेरलेन का शासन था | यह वही तामेरलेन है जिसे हम तैमूरलंग के नाम से जानते हैं और जिसने दक्षिण-पूर्वी एशिया, मध्य एशिया, अफ्रीका, मंगोलिया, योरोप के कुछ हिस्सों पर आक्रमण किया था और अपने आतंक का कहर बरपाया था | तैमूरलंग ने दिल्ली पर १३९८ में आक्रमण कर तबाही मचाई थी | उस समय दिल्ली पर नसीरुद्दीन मुहम्मद शाह तुगलक का शासन था | संभव है कि जहाँ-जहाँ तैमूर गया हो उसके साथ-साथ मुल्ला नसीरुद्दीन भी रहा हो | क्योंकि, दुनिया के उन्हीं देशों में मुल्ला नसीरुद्दीन जिन्दा है जहाँ तैमूर के आक्रमण हुए | आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिजेंडरीको निजंधरीकथाओं के रूप में व्याख्यायित करते हुए यह मन है कि, विभिन्न गण-समाजों के आपसी तालमेल तथा भिन्न-भिन्न जातियों, समूहों गणों और जनपदों के मिलने-जुलने से जो संस्कृति विकसित हुयी और जो सभ्यताएँ पनपीं उनमें देश-काल की सीमाएँ खत्म हो गयीं |
एस्कीशेहिरतुर्की के सबसे पुराने बसे शहरों में से है | ‘एस्कीका अर्थ है पुराना और शेहिरतो शहर है ही | यहाँ जो लोग दिल्ली घूमकर आये हैं वे बताते हैं कि एस्की दिल्लीऔर येनी दिल्लीदोनों देखा | ‘येनी दिल्लीका मतलब नयी दिल्ली | तो मैंने भी एस्किशेहिर जाने और मुल्ला का गाँव देखने कि योजना बना डाली और पहुँच गया शिवरीहिसार’ | अंकारा से जो मुख्य सड़क एस्कीशेहिरको जाती है उस पर ४०-४५ किलोमीटर चलने पर एक क़स्बा पड़ता है जिसका नाम शिवरीहिसारहै | इस चौराहे से दायें मुड़कर थोड़ी दूर चलने पर नसीरुद्दीन का गाँव पड़ता है | मेरे साथ मेरा एक छात्र भी था जिससे सुविधाजनक ढंग से मैं गांव में पहुँच गया | पर, तुर्की के कोय’ (गाँव) भारतीय गाँवों की तरह नहीं हैं | प्राकृतिक सुंदरता से भरे हुए आधुनिक सुख-सुविधाओं से संपन्न छोटे-छोटे गांव | घर-बाहर दोनों साफ़-सुथरे | शिवरीहिसारऔर उससे आगे  एस्कीशेहिर देखकर लगा कि, इन्हें पुराना क्यों कहा जाता है देखने में तो ये कहीं से भी पुराने नहीं लगते |  नाम के ठीक विपरीत | वैसे ही जैसे भारतेंदु ने सरयू पार की यात्रा में बस्ती के लिए लिखा है – ‘याकौ यदि बस्ती कहूँ तो काकौ कहूँ उजाड़ |’ एकदम विपरीत प्रभाव | शिवरीहिसारमें जिस घर को मुल्ला का जन्मस्थान मान जाता है वह तुर्की सरकार द्वारा लोक-संस्कृति की दृष्टि से विकसित किया गया एक महत्वपूर्ण स्मारक है |
मुल्ला नसीरुद्दीन के बारे में तरह-तरह कि किम्वदंतियां प्रचलित हैं | वह तुर्की लोक-कथाओं का अलहदा नायक है | वह फ़कीर है | वह सूफी है | वह हकीम है | वह मंत्री है | वह जज है | वह ज्योतिषी है | वह खगोलविद है | जिसकी समस्या का निदान जिस चतुराई से किया उसने मुल्ला को वही मान लिया | एक बार मुल्ला के घर के सामने से सड़क पर एक स्त्री अकेली जा रही थी | उसके पीछे एक आदमी चल रहा था | आदमी ने लपक कर स्त्री को अपनी बाहों में भरकर चूम लिया | स्त्री उसे भला-बुरा कहने लगी | शोर सुनकर मुल्ला बाहर निकल कर  आये | पूछा, क्या हुआ ? स्त्री ने कहा कि, इस आदमी ने मेरे साथ बद्तमीजी की है | इसको मैं जानती तक नहीं फिर इसकी हिम्मत कैसे हुयी मुझे चूमने की | मैं इसकी इस गुस्ताखी का बदला लेकर रहूंगी | मुझे न्याय चाहिए | मुल्ला नसीरुद्दीन ने बड़े ध्यानपूर्वक स्त्री को देखा और कहा हाँ तुम्हें मुकम्मल न्याय मिलना चाहिए, तुम ऐसा करो कि, इस आदमी का चुम्बन लेकर अपना बदला चुकाओ | स्त्री का चेहरा शर्म से लाल हो गया और वह धत् करके बांकी मुस्कान होंठों पर लिये वहाँ से चली गयी | तो, यह था मुल्ला का न्याय | अपने त्वरित बुद्धि और चतुराई से विकट से विकट परिस्थिति और संकट को हँसी-मजाक में हल कर देना मुल्ला नसीरुद्दीन की खासियत थी | मध्य-युग में तुर्की में आम जन-जीवन में गधे का खास महत्व था | सामन ढुलाई से लेकर सवारी करने तक गधा उपयोग में लाया जाता था | वह तुर्की जन-जीवन का एक उपयोगी पारिवारिक सदस्य की तरह था | मुल्ला नसीरुद्दीन भी गधा की सवारी करता था | पर उनका अंदाज विलक्षण था | वह गधे पर घूमकर उल्टा बैठता था | गधे के मुंह की ओर उसकी पीठ होती थी | सब यह देख कर हैरान होते कि यह कैसा मूर्ख है | एक बार कुछ लोगों ने मुल्ला से यह पूछा कि तुम गधे पर उल्टा क्यों बैठते हो ? मुल्ला का चट जवाब, ताकि, लोग मुझे गधे का विपरीत माने | शिवरीहिसारके मुख्य चौराहे पर गधे पर उल्टी दिशा में बैठे हुए सूफी दरवेश की साज-सज्जा में एक व्यक्ति कि विशालकाय प्रतिमा लगी है जो कि नसीरुद्दीन होद्जा की है |
लोक-संस्कृति में लोक-आख्यानों, कहावतों, चुटकुलों, मुकरियों आदि का विशेष महत्व रहा है | ऊपरी तौर पर तो अभिव्यक्ति के इन रूपों को सतही  मजाक मानकर क्षणिक मनोरंजन का साधन मात्र समझ लिया जाता है पर अपनी आंतरिक संरचना में इन वाचिक रूपों में समय-समाज की विद्रूपताओं का ऐसा उपहासात्मक-चित्र होता है जो अपनी अर्थ-छवियों में प्रतिरोधी और आलोचनात्मक होते हैं | लोक-प्रतिरोध का यह भी एक खास तरीका था | उस भयानक सेंसरशिप के ज़माने में विद्रूपताओं को व्यंग्य और उपहास के जरिये जन-जन तक पहुँचाने की एक विशेष शैली के रूप में जन-मानस इसका उपयोग करता रहा है |
इस तरह मुल्ला नसीरुद्दीन मध्यकाल का एक ऐसा ऐतिहासिक चरित्र था जो अपनी प्रसिद्धि के चलते संज्ञा न रहकर एक विशेषण बन गया और भूगोल और तवारीख की सारी हदें पार कर दुनिया भर के कई देशों में अपनी बुद्धि और चतुरायी के किस्सों के साथ लोगों के बीच आज भी जिन्दा है |

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युवा आलोचक | पक्षधर पत्रिका का संपादन-प्रकाशन | दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी का अध्यापन | आजकल अंकारा विश्वविद्यालय, अंकारा (तुर्की) में विजिटिंग प्रोफ़ेसर |
ई-मेल :  tiwarivinod4@gmail.com फोन:+903124418757 मोबा. +9005303639128   

30 मार्च 2013

एस्पेंदोस : बीते कल की उतरती भव्य सीढ़ियाँ



समकालीन सरोकार, मार्च २०१३
एस्पेंदोस : बीते कल की उतरती भव्य सीढ़ियाँ         
विनोद तिवारी
पिछले दिनों प्राचीन रोमन साम्राज्य और अब तुर्की गणराज्य के एक राज्य ‘अनातोलिया’  की यायावरी पर निकला था | अनातोलिया प्राचीन ग्रीको-रोमन सभ्यता और संस्कृति का वह भूभाग है जो अपने तमाम तवारीखी चिन्हों और प्रमाणों के साथ आज आधुनिक तुर्की का हिस्सा है | इस   प्रदेश का प्रमुख नगर है ‘अंताल्या’|  यह महानगर अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान के नाते तुर्की की सांस्कृतिक राजधानी भी है | भूमध्य-सागर के किनारे बसा यह नगर अपनी प्राकृतिक सुंदरता के कारण  पिछले साल विश्व के पर्यटन स्थलों में न्यूयार्क को पीछे धकेल कर तीसरे स्थान पर काबिज हो गया | योरोप के सैलानियों का यह अत्यंत ही पसंदीदा जगह है | हम कश्मीर-घाटी के बारे में सुनते आये हैं कि, वहाँ की प्राकृतिक छटा पर मन्त्र-मुग्ध होकर मुग़ल बादशाह जहाँगीर के मुंह से बेसाख्ता निकला था – गर फिरदौस बर-रू-ए ज़मीन अस्त/हमीं अस्त, हमीं अस्त (धरती पर यदि कहीं स्वर्ग है तो वो यहीं है, यहीं है) | सचमुच वह है भी, पर अंताल्या को देखने के बाद लगा कि नहीं पौराणिक-कथाओं में भले ही एक ही स्वर्ग – देवताओं वाले स्वर्ग – की कल्पना की गयी हो पर धरती पर एक नहीं अनेक स्वर्ग हैं | अंताल्या की प्राकृतिक सुंदरता के कारण ही इसे ‘धरती का स्वर्ग’, ‘भूमध्य-सागर का मोती’ और ‘तुर्की का रिवेरा’ कहा जाता है | इस नगर की स्थापना के पीछे जो पुराना किस्सा प्रचलित है वह यह है कि, पेर्गियन राजा अतालोस-द्वितीय ने एक समय यह राजाज्ञा जारी की और अपने मातहतों को चारों दिशाओं में भेजा कि जाओ और मेरे लिए इस धरती पर जो सबसे सुन्दर जगह हो उसकी तलाश करो जिसे देखकर दूसरे राजा इर्ष्या करें | चारों दिशाओं में सैनिक भेज दिए गए | वे घूम-घूम कर एक से एक सुन्दर जगह की तलाश करते और राजा से उसका बखान करते पर राजा को जगह पसंद नहीं आती | दिन, महीने, साल बीतते गए राजा को कोई जगह पसंद न आये | अंत में सैनिक थक हार-कर भूमध्य-सागर के किनारे पहाड़ों और पेड़ों से घिरी एक घाटी में आराम करने के लिए रुके | कुछ ही समय में उनकी थकान जाती रही | उनके सेनापति ने इस जादू का निरिक्षण करना शुरू किया | उस जगह को देखकर वह अभिभूत हो उठा | उसने मन ही मन पक्का कर लिया कि यह जगह अतालोस-द्वितीय को जरूर पसंद आयेगी | वह राजा के पास आया और उसने भूमध्य-सागर के किनारे की इस प्राकृतिक छटा का वर्णन राजा से किया | राजा ने इस सुंदरता खुद चलकर देखने की इच्छा जाहिर की | जब वह सैनिकों के साथ वहाँ पहुंचा तो वहाँ की प्राकृतिक सुंदरता को देखकर दंग रह गया | भूमध्य-सागर का अथाह, अछोर नील-विस्तार उसके ऊपर आसमान का नीला परिधान जिसका किनारा पीताभ-रेत से रंगा हुआ, दूर तक पहाड़ियों और प्राकृत हरे-भरे पेड़-पौधों की निर्मल, बेदाग़ और आकृष्ट करने वाली सुंदरता ने अतालोस-द्वितीय को इस कदर मोहित किया कि उसने तुरंत आदेश जारी किया कि स्वर्ग की तरह इस अत्यंत मनोरम जगह पर शीघ्र ही सर्व-सुविधा-संपन्न नगर का निर्माण कराया जाय | निर्माण के बाद राजा के सम्मान में इस नगर का नाम रखा गया – ‘अत्तालिया’ (या अट्टालिया) | बाद में यही अत्तालिया अंताल्या हो गया |
पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर पुरातत्वविद यह मानते हैं कि यह भूखंड आद्य-ऐतिहासिक पलियोलिथिक-युग में ‘पाम्फिलिया’ का हिस्सा रहा होगा | अंताल्या के राष्ट्रीय संग्रहालय में सेरामिक और पत्थर के जो भांड रखे गए हैं उनके आधार पर पुरातत्वविद इसके निर्माण का समय 3000 B.C. मानते हैं, कांस्य-युग के पहले | ईसा-पूर्व तेरहवीं शताब्दी से यहाँ हित्ती-साम्राज्य का इतिहास मिलने लगता है | ईसा-पूर्व छठी शताब्दी में यह फारसियों के अधिकार में आता है और ईसा-पूर्व ३३४-३३ में सिकंदर के आक्रमण से पूर्व तक उनके अधिकार में रहता है | ईसा-पूर्व ३३४-३३ में यहाँ सिकंदर महान के नेतृत्व में यूनानी-साम्राज्य का परचम लहराता है | सिकंदर की मृत्यु के बाद उसके सेनापतियों, पहले एन्तिगोनस और उसके बाद टालेमी यहाँ शासन करते हैं | बाद में यह ईसा-पूर्व ७७ में रोमनों के आधिपत्य में आता है और आजकल तुर्की गणराज्य का हिस्सा है | यह तो रहा अंताल्या का एक संक्षिप्त ऐतिहासिक परिचय |
हमने अंताल्या शहर के अलावा उससे लगे कई महत्वपूर्ण एतिहासिक स्थलों को देखा | इन्हीं ऐतिहासिक स्थलों में एक महत्वपूर्ण अवशेष ‘पेर्गे’ है | अंताल्या से १७ किलोमीटर पूरब  हेलिनिस्टिक सभ्यता की निशानी और आक्सू नदी के किनारे बसी पाम्फिलिया की राजधानी पेर्गे | आज ‘पेर्गे’ एक ध्वन्साशेष खँडहर मात्र है और आक्सू नदी अस्तित्व में नहीं है | परन्तु, इन ध्वन्साशेष खंडहरों को देखकर अनुमान किया जा सकता है कि इनका स्थापत्य अपनी भव्यता और गौरव के चलते कितना आकर्षक रहा होगा | ग्रीको-रोमन साम्राज्य की वास्तुकला का अद्भुत नमूना | पेर्गे का ईसाईयों के लिए तीर्थ जैसा महत्व है | ईसाई धर्म के महत्वपूर्ण प्रचारक और अपने को ईसा का शिष्य मानने वाले सेंट पॉल ने यहीं आक्सू नदी के किनारे बैठ कर ‘न्यू टेस्टामेंट’ का लेखन पूरा किया | इसलिए यह नगर और नदी ईसाईयों के लिए एक पवित्र स्थल है | वे पूरी श्रद्धा के साथ आज भी पेर्गे को उसी रूप में महत्व देते हैं | मशहूर पेर्गेनियंस में प्रसिद्ध गणितज्ञ और ज्योतिर्विद अपोलोनियस का नाम आता है | अपोलोनियस के अलावा महान दार्शनिक वारुस का भी पेर्गे से सम्बन्ध था | पेर्गियन साम्राज्य अपने सांस्कृतिक-वैभव के लिए मशहूर था | कला, दर्शन और साहित्य-संस्कृति का स्वर्णिम काल | वैसे भी प्राचीन-विश्व के सांस्कृतिक इतिहास में अपनी उन्नत सुरुचि और कलात्मक-अभिज्ञान में यूनान, मिस्र, रोम और हिदुस्तान का ही नाम आता है | पेर्गे को देखकर ग्रीको-रोमन भव्यता और गौरव का भान होता है | बाद में पता चला कि यहाँ कई हिन्दी फिल्मों की शूटिंग हो चुकी है | कई हिन्दी फिल्मों के गाने यहाँ फिल्माए गए हैं |
पेर्गे के ध्वन्साशेष खंडहरों में कुछ अवशेष आज भी बचे हुए हैं, तुर्की सरकार ने उनको यथावत सुरक्षित रखने का हर जतन किया है और उनको उपयोग में लाया जाना संभव किया है | ऐसे ही जतन से बचायी गयी एक जो सबसे महत्वपूर्ण जगह है वह है 2000 साल पुराना मुक्ताकाशी थियेटर एस्पेंदोस | प्राचीनतम रोमन थियेटरों में से एक जो आज भी अपने अतीत-गौरव के साथ अपनी भव्यता और उत्कर्ष के दिनों की कहानी बयां करता है | रोमन कॉमेडी, ट्रेजेडी और एटलान   नाटकों के भव्य इतिहास और संस्कृति की गवाही देता भव्य निर्माण | कल्पना कीजिये कि इस थियेटर में जब लिवियस अन्द्रोनिकस, प्लाउतस, टेरेन्स, सेनेका, एनेनियस, होरेस, सिसरो आदि महान कवि-नाटककारों को जब प्रस्तुत किया जाता रहा होगा तो क्या भव्यता रहती होगी | एस्पेंदोस के बारे में जी.ई. बीन ने लिखा है कि, ........अब तक मैंने जो कुछ देखा है इसके जैसा कुछ भी नहीं |प्रसिद्द ब्रिटिश पुरातत्वविद डी.जी. होगैर्थ का कहना है, आपने इटली, फ़्रांस, यूनान इत्यादि में वास्तुकला के बहुत ही आकर्षक नमूने देखे होंगे पर इस थियेटर जैसा वे नहीं हैं | एस्पेंदोस एशिया और अफ्रीका में रोमनों द्वारा निर्मित थियेटरों में सबसे प्राचीन ऐसा थियेटर है जो आज भी सुरक्षित है और अभिनय के लिए उपलब्ध है | इसका निर्माण 161-180 ईस्वी में रोमन सम्राट मारकस आरेलियस के समय में हुआ | इसका वास्तुविद् था मशहूर रोमन वास्तुकार जेनो | थियोडोरस का बेटा जेनो | बाद में राजकुमारी का विवाह जेनो के साथ हुआ | कहा जाता है कि, रोमन सम्राट मारकस ने यह घोषणा प्रसारित करवाई थी की मैं दो ऐसे निर्माण करना चाहता हूँ जो राज्य के लिए सबसे लाभप्रद और सुन्दर हो | जिसे लोग देखें तो देखते रह जायं | इनमें से जो सबसे सुन्दर होगा उसको बनाने वाले कलाकार से मैं अपनी बेटी का विवाह करूँगा | दो वास्तुविदों ने दो तरह के निर्माण किये | एक ने एक ऐसा जलाशय तैयार किया जो पूरे नगर को जल उपलब्ध करता था पर जिसके जलस्रोत का पता लगाना मुश्किल था | दूसरे ने एक ऐसा विशाल मुक्ताकाशी थियेटर बनाया जो अपने वैज्ञानिक और कलात्मक उत्कर्ष का अद्भुत नमूना है | राजा ने दोनों को देखा और उसे जलाशय पसंद आया | वह राजकुमारी को जलाशय बनाने वाले कलाकार के साथ ब्याहने का इच्छुक था | पर कहा जाता है कि, राजकुमारी थियेटर को देखकर इतना मुग्ध हुयी की उसको बनाने वाले कलाकार से वह मन ही मन प्यार करने लगी | राजा को जब यह पता लगा तो उसने यह निश्चित किया की वह एक बार दोबारा थियेटर का निरीक्षण करेगा | राजकुमारी भी अपने पिता के साथ थी | वे दोनों जब बैठने के लिए शिलाओं से बनी अर्ध-वृत्ताकार अति-विशाल सीढियों पर चढ़ते हुई सबसे ऊपर पहुंचे तो नीचे सबसे बीच में मंच वाली जगह पर जेनो अपने एक दूसरे सहयोगी से कह रहा था यह राजकुमारी मुझे चाहती है, यह मेरी है | जेनो ने यह बात अत्यंत ही धीमी आवाज में कही थी पर इसको सबसे ऊपर खड़े राजा और राजकुमारी ने साफ़-साफ़ सुना | राजा आश्चर्य से भर उठा | ध्वनि संबंधी थियेटर की इस अद्भुत वास्तु-क्षमता ने राजा को अभिभूत कर दिया उसने तुरंत अपना निर्णय बदलते हुए यह घोषणा की कि, वह अपनी बेटी का विवाह जेनो के साथ करेगा | और उन दोनों का विवाह उसी थियेटर में भव्य राजसी वातावरण में संपन्न हुआ | आज भी थियेटर में ध्वनि के लिए अत्याधुनिक यांत्रिक उपकरणों की जरूरत नहीं पड़ती |
यह मुक्ताकाशी थियेटर अपनी अद्भुत वास्तुकला से आज भी लोगों को आकर्षित करता है | इसकी खोज ट्रोजन युद्ध के बाद तेरहवीं शताब्दी में हुआ जब तुर्की पर सेल्जुक तुर्कों का शासन था | खोज के बाद इस अद्भुत वास्तु की मरम्मत प्रसिद्द सेल्जुक शासक अलादीन कैकुबाद-प्रथम ने कराया | पुनः बीसवीं शताब्दी में तुर्की गणतंत्र के संस्थापक मुस्तफा कमाल अतातुर्क ने इसकी मरम्मत और साज-सज्जा कराकर इसे उपयोग में लाने लायक बनाया | 15 से 20  हज़ार तक लोगों को अपने अंदर स्थान देने वाले इस मुक्ताकाशी थियेटर में आज भी प्रति वर्ष तुर्की सरकार  अन्तराष्ट्रीय ओपेरा और बैले महोत्सव’ का आयोजन करती है | आज भी इस थियेटर में पूँजीपति और प्रभु-वर्ग के लोगों के वैवाहिक समारोह संपन्न होते हैं |  विश्व भर में होने वाले ओपेरा और बैले उत्सवों में जो शीर्ष दस उत्सव हैं उनमें ‘एस्पेंदोस अंतर्राष्ट्रीय ओपेरा और बैले महोत्सव’ पांचवें स्थान पर है | जून के महीने में होने वाले इस महोत्सव में दुनिया भर से दर्शक आते हैं | सत्तर प्रतिशत दर्शक बाहरी ही होते हैं | दुनिया भर की टीमें यहाँ प्रस्तुति के लिए आती हैं | इसबार का महोत्सव 22 जून से शुरू होगा | मैंने कार्यक्रम बनाया है कि इसबार एस्पेंदोस का ओपेरा और बैले महोत्सव जरूर देखूं |
‘एस्पेंदोस’ के अतिरिक्त जो एक अन्य जगह आज भी सुरक्षित है वह है पेर्गे का स्टेडियम (स्तेदियोन) | ‘एस्पेंदोस’ थियेटर के उत्तर में कुछ ही दूरी पर बना यह स्टेडियम अपनी वास्तुकला में थियेटर जैसा ही है | इसमें 12 हज़ार लोग एक साथ बैठ सकते हैं | इन अलहदा निर्मितियों से रू-ब-रू होते हुए, बीते कल की इन उतरती भव्य सीढ़ियों को देख कर अपनी हस्ती में पैबंद रहते हुए शायर की उस कहन पर थोड़ा ठिठकना पड़ता है जिसमें वह कहता है – यूनान मिस्र रोमा सब मिट गए जहां से |
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युवा आलोचक | पक्षधर पत्रिका का संपादन-प्रकाशन | दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी का अध्यापन | आजकल अंकारा विश्वविद्यालय, अंकारा (तुर्की) में विजिटिंग प्रोफ़ेसर |
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