21 नवंबर 2015

अखान – बखान

भारतीय संस्कृति की मूल रहन में देशीवाद का आधुनिक महाकाव्य

  (हिंदू धर्म की तथाकथित धारणाओं और प्रदत्त छवियों का बहुस्तरीय, बहुमुखी, बहुवर्णी प्रत्याख्यान)


             विनोद तिवारी

           
इस अंक से हम ‘अखान-बखान’ नाम से एक स्तम्भ शुरू कर रहे हैं | इस स्तम्भ के लेखन विनोद तिवारी मंतव्य के पाठकों के लिए हर अंक में भारतीय भाषाओं में प्रकाशित और हिंदी या अंग्रेजी में उपलब्ध किसी एक उपन्यास का आलोचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करेंगे | शुरुआत, प्रख्यात कथाकार भालचंद्र नेमाडे के बहुचर्चित और बहसतलब मराठी उपन्यास ‘हिंदू : जगण्याची समृद्ध अडगळ’ के हिंदी अनुवाद (अनु. गोरख थोरात)  हिंदू : जीने का समृद्ध कबाड़ से | - सं.

कौन है ?
मैं, मैं हूँ खंडेराव |
ख़ामोशी | फिर मैं पूछता हूँ, तुम कौन हो ?
मैं तुम ही हूँ खंडेराव |
तनिक बेचैनी से मैं फिर पूछता हूँ, यानी ? मैंने तुमसे ही पूछा की मैं कौन हूँ ? अपने आप से ही पूछने जैसा है कि मैं कौन हूँ ? फिर वह कौन है ? मैं ही ?हाँ अब ठीक है तभी हम कुछ बतिया पायेंगे | खंडेराव मैं, तुम, वह सब एक ही हैं |
इस पर खामोशी | कई सदियों की | निःशब्द |
और खंडेराव, बस कहानी ही सुनाते जाओ यार |
राम, राम ये तो बड़ी मुसीबत आ गयी मुझ जैसे आदमी पर | आजकल सभी के पास कहने के लिए बहुत कुछ होता है, बस कहानी नहीं होती |

बस, शुरू होती है संस्कृति और पुरातत्व के अध्येता, खानदेसी, मोरगाँव के वारकरी पंथी हिन्दू
पाटील श्री खंडेराव विट्ठल द्वारा कही कहानी ‘हिंदू : जगण्याची समृद्ध अडगळ’ (हिंदू : जीने का समृद्ध कबाड़) | एक वृहद् आख्यान, जिसमें मैं, तुम और वह का कोई अध्यात्मिक गूढ़ार्थ पा लेने की दार्शनिक महत्वाकांक्षा नहीं है वरन ‘भारतीय समाज की जातीय सांस्कृतिक अधिरचना’ को खोजने और उसी में से ‘मैं’ और ‘तुम’, ‘वह’ और ‘अन्य’ की मूल संरचना को खोजने समझने की एक जदोजहद | इसीलिए यह उपन्यास “न गौरव के किसी जड़ और आत्ममुग्ध आख्यान का परिपोषण करता है न ‘अपने’ के नाम पर संस्कृति की रगों में रेंगती उन दीमकों का तुष्टिकरण, जिन्होंने ‘भारतवर्ष’ को भीतर से खोखला किया है | यह उस विराट इकाई को समग्रता में देखते हुए चलता है जिसे भारतीय संस्कृति कहते हैं |”[1]
भारतीय उपन्यासकारों में भालचंद्र नेमाड़े का स्थान एक यथार्थवादी और विश्व-सजग कथाकार के रूप आता है | महज 25 साल की आयु में ‘कोसला’ (1963) जैसा महत्वपूर्ण उपन्यास लिखकर नेमाड़े ने मराठी उपन्यास की रूमानी और सौंदर्यवादी संरचना को तोड़ दिया | उसके बाद ‘चांगदेव चतुष्टय’ के तहत लगातार चार उपन्यास- ‘बिढार’ ‘हूल’ ‘जरिला’ और ‘झूल’ लिखकर मराठी उपन्यास की दिशा ही बदल दी और देसीवाद का एक नया यथार्थ प्रस्तुत किया | नेमाड़े उपनिवेशवादी आधुनिकता और फैशन के बहुत बड़े क्रिटिक हैं | वे देशीवाद (nativism) के हिमायती हैं | इसीलिए, वे औपनिवेशिक इतिहासवाद की, ओरिएण्टल लेखन व चिंतन की, अंग्रेजियत और उसकी गुलामी की भरपूर आलोचना करते हैं | भारत में कुछेक लेखकों-रचनाकारों ने जिस जिद के साथ अपना लेखन शुरू किया कि वे अंगरेजी में न लिख कर अपनी मातृभाषा में रचेंगे-लिखेंगे, भालचन्द्र नेमाड़े उनमें से एक हैं | भारतीयता के सम्बन्ध में वे, वी.एस. नायपाल और सलमान रुश्दी के दृष्टिकोणों की आलोचना करते हैं | उनका कहना है कि, “ ये दोनों (रुश्दी और नायपाल) पश्चिम के बिचौलिए (panders) हैं |[2] नेमाड़े किसी भी तरह के सार्वभौमवाद के विरोधी हैं | वे, उस साम्राज्यवादी सोच और अवधारणा के विरोधी हैं जिसमें स्थानीयता, देशजता, उसकी बहुविध पारम्परिक रहन, सामाजिक-सांकृतिक अस्मिता, भाषिक पहचान सबकुछ को मिटाकर एक तरह की सांस्कृतिक-छवि निर्मित की जाय | एक ही ढर्रे के, एक ही तरह के सांचे में सबकुछ को ढाल दिया जाय | यही कारण है कि, वे इस उपन्यास में जहाँ एक ओर औपनिवेशिक विकास और आधुनिकता की आलोचना करते हैं, खिल्ली उड़ाते हैं वहीं दूसरी ओर हिन्दू धर्म की ‘हिन्दुत्ववादी’ संरचना और वर्चस्व को भी नकारते हैं | वे हिन्दू धर्म की ‘हिन्दुत्व’ वाली अवधारणा, उसके मुस्लिम-विरोधी रेटारिक, शुद्धतावादी-दृष्टिकोण, देववाणी संस्कृत के अभिजनवादी-ब्राह्मणवादी वर्चस्व और उसके राजनीतिक-धार्मिकीकरण की उपन्यास में जम कर आलोचना करते हैं | उनकी स्पष्ट मान्यता है कि, ब्राह्मणवाद और उपनिवेशवाद इन दोनों ने मिलकर इस देश को जितना खोखला, जर्जर और दयनीय बनाया उतना किसी और ने नहीं | यह सवाल उठाते हैं कि, ये सारी चीजें कब हिन्दू धर्म का हिस्सा बनीं ? किस इतिहास के प्रभाव में आकर हिन्दू धर्म क्रिया-प्रतिक्रिया के उसूलों पर चलने लगा ? उपन्यास के शुरू में ही मोहेनजो-दड़ो के एक कैम्प में मातृसत्ताक सिन्धु-सभ्यता की एक वृद्धा से सपने में खंडेराव की बातचीत चल रही है | उस बातचीत के बाद खंडेराव अब तक के उपनिवेशवादी ओरिएण्टल पुरातत्व और इतिहास की स्थापनाओं और धारणाओं को ख़ारिज करता है | वह भृगुओं को, परशुराम को आक्रान्ता आर्यों के प्रतिनिधि के रूप में प्रस्तुत करता है जिसे इक्ष्वाकुकुलीन मुंडावंशीय काले राम ने पराजित किया था | सपने में ही उसे वैदिक ऋषि कुलों का एक बड़ा कुपित दल उस की और आते हुए दिखाई देता है | खलबली मच गयी है – “ कौन है ये विट्ठल ? द्रविण, मुंडा, कौन है ये अकिंचन शिश्नपूजक मूरदेव, जो इतिहास को पलटना चाहता है ? वृत्त से गर्भिणी हुए जननी से जन्मा ? कुरु या पांचाल ? यदु या मानव या तुर्वश ? क्या ब्राह्मण मुक्त हिन्दू धर्म कभी संभव है ? इस आर्याव्रत में हर युग में ब्राह्मण ही राज्य करेंगे | ब्राह्मण-विरोधी बौद्ध, इसाई, मुसलमान, महानुभाव, वारकरी, कम्युनिस्ट सोशलिस्ट, कैपिटलिस्ट, फासिस्ट- सभी धर्मों का नेतृत्व ब्राहमण ही करेंगे | इधर सिन्धु की ओर से खदेड़ेंगे तो तो परशुराम का यह लेहंड़ा समुद्र मार्ग से कोंकण में घुसकर राज्य करेगा  अटक तक आएगा |” (p.17)

उपन्यास के नायक खंडेराव विट्ठल की इतिहास और पुरातत्व की समझ और दृष्टि इस धारणा पर टिकी है कि, ‘भारतीयता’ और ‘हिंदू धर्म’ की जो प्रदत्त छवियाँ हैं वह उसकी मूलगामी प्रकृति और व्यवहार के विरुद्ध हैं | नेमाड़े, इस उपन्यास में इसी मूलगामी प्रकृति और व्यवहार को खोजने और पाने का आख्यान रचते हैं | इस रचना में वे मार्क्सवादी इतिहासकार डी.डी. कोशाम्बी की लाईन पर चलते हैं | खंडेराव डेक्कन कॉलेज, पुणे में अपने शोध का विषय बताता है – “पुरातत्व में संवेदनाओं का स्थान” | उसके निर्देशक बनने वाले प्रो. संखालिया भड़क उठाते हैं, यह भी कोई विषय है ? तुम्हारा दिमाग तो नहीं फिर गया है | ‘‘संवेदना जैसे ललित कवि-कल्पित विषय का पुरातत्व में कोई स्थान नहीं है |’’ (p. 24) तर्क यह कि, साहित्य और इतिहास में तो इस तरह के कपोल-कल्पित गप्प चल जाते हैं, लेकिन; ‘‘पुरातत्व केवल भौतिक संस्कृति की ही खोज करता है और वह भी तात्कालिक पुनर्रचना करने के लिए |” (p. वही) पर, इस विषय पर खंडेराव और संखालिया सर के बीच दो-तीन घंटे की लंबी बहस होती है | “सर, फिर सम्बंधित काल की संवेदनाएं कहाँ जाती हैं ? लिपि, घरों की रचना, सड़कों की रचना, नगर रचना, परकोटा, मुद्रा, चित्र, मूर्ति इन सभी बातों के पीछे क्या सचमुच कोई संवेदना नहीं होती है ? और यदि होती है तो उनकी खोज को हमारे कार्यक्षेत्र में शामिल क्यों  न किया जाय ?” (वही) इस बहस में खंडेराव जिस ढंग से तर्कों और आधारों को प्रस्तुत करता है वह निश्चित ही इतिहास और पुरातत्व की उस ओरिएण्टल समझ को तार-तार कर देता है जिसमें सामजिक-सांस्कृतिक संरचनाओं में विभिन्न जातियों के रहन-सहन, आचार-विचार, अभिव्यक्तियों, संवेदनाओं आदि का कोई महत्व नहीं | उपन्यास की एक यूरोपियन पात्र, इतिहास और पुरात्तव की शोध-छात्र, संस्कृति और इतिहास के पाश्चात्य पंडित प्रो. ए. एल. बाशम की शिष्या और खंडेराव की दोस्त मंडी, खंडेराव के समर्थन में कहती है – “सर, रूसी आर्कियोलॉजिस्ट एक्सटर्नल आर्कियोलॉजी की यह भी एक पद्धति मानते हैं |” (p. 25). वह स्लाव लोगों का उदहारण पेश कर इस पर जोर देती है कि ध्वस्त सभ्यता का पुरातात्विक अध्ययन केवल उपलब्ध कंकालों, मुद्राओं, भांडों आदि को वैज्ञानिक और बौद्धिक आकलन की परिधि में लाकर ही नहीं होता बल्कि उसका एक पक्ष उस स्थल और काल की जीवनगत-संवेदनाओं में भी होता है | खंडेराव, मंडी के समर्थन के बाद अपनी बात को और मजबूती से रखने के लिए अपने ही गाँव के बगल के एक गाँव हरिपुरा का उदहारण प्रस्तुत करता है जो पिंडारियों के आक्रमण के कारण तहस-नहस हो गया | वह अंत में यह निष्कर्ष देता है कि, “अब तो मनोविज्ञान भी यह कहने लगा है कि, व्यक्तिगत संवेदनाएं सामजिक होती हैं ऐतिहासिक होती हैं, और तो और वंशीय भी होती हैं |” (वही). खंडेराव की इस पूरी बहस का जोर इस बात पर है कि, सिन्धु-सभ्यता का विनाश प्राकृतिक आपदा या किसी महामारी के कारण नहीं हुआ वरन बाहरी आक्रमण के फलस्वरूप ही हुआ | दरअसल, यह उपन्यास संवेदनहीन, प्राणहीन, ठस्स, आंकड़ों, प्रमाणों, तर्कों, निष्कर्षों के सामानांतर जातीय-जीवन की बहुविध सांस्कृतिक स्तरीयता को विस्तार से प्रस्तुत करते हुए स्थापित और रूढ़ हो चुकी उन मान्यताओं और धारणाओं को खिलाफ एक नयी पुनर्रचना करता है | प्रचलित आख्यान का पुनराख्यान | राष्ट्रवादी और अभिजात इतिहास और पाठ का पुनर्पाठ | इसीलिए एक ही धर्म के, एक ही वर्ग के, एक ही आस्था और विश्वास के, एक ही जाति और रहन के, जो विविध और बहुस्तरीय लक्षण हैं उनको समझने और रचने की जो बारीकी इस उपन्यास में बरती गयी है उससे उपन्यास अपने दृष्टिकोण को पूरी तरह रख पाने में सफल हुआ है | कृषि और श्रम-संस्कृति में स्त्रियों की क्या सामाजिकी थी ? दलितों की क्या स्थिति थी ? हिन्दू धर्म कब श्रम की महत्ता को छोड़कर परोपजीवी निरर्थक ब्राह्मणवादी संरचना का आखेट बना ? सामाजिक निर्माण और विकास में सभ्यता के नाम पर श्रम-संस्कृति की केन्द्रीयता को किस तरह तथाकथित आधुनिक समाजों ने नकार कर एक भोगवादी नकली और खोखली सभ्यता और संस्कृति का विकास किया ? इन सारे प्रश्नों के उत्तर 6 खण्डों के इस वृहद् उपन्यास में, नेमाड़े अपनी जातीय-चेतना और स्मृति के बल पर उनकी जड़ों में पैठकर ढूँढने-कुरेदने की कोशिश करते हैं | इसकी, आधारभूमि खंडेराव से एक शोध-आलेख प्रस्तुत करा कर नेमाड़े पहले ही खंड में तैयार कर देते हैं |

मोहेनजो- दड़ो की खुदाई के लिए यूनेस्को ‘यूनेस्को मोहेनजो-दड़ो 1963’ नाम से एक प्रोजेक्ट तैयार करता है | कुच्छ विदेशी और कुछ भारतीय पुरातातत्वविदों और अध्येताओं के साथ मोहेनजो-दड़ो में खुदाई का कैम्प लगता है | इसी प्रोजेक्ट के लिए खंडेराव द्वारा तैयार किये गए शोध-आलेख को प्रस्तुत करने के लिए कहा जाता है | वह पूरी तैयारी के साथ आया है | मंच पर सबसे पहले वह सप्त-सैन्धव प्रदेश का एक मानचित्र टांग देता है | फिर प्रोजेक्टर चला कर वह नष्ट हुए करीब 150 नगरों के स्लाइड दिखाते हुए अपना लेख प्रस्तुत करता है – “ हड़प्पा, पिलाक, मेहेरगढ़, कुल्ली, अमरी झोब, नाल कान्हूदड़ो, झुकर, बैक्ट्रिया की शोर्तुगई, दासली, लोथल – मित्रो, उझबेकिस्तान से कच्छ तक की  इन उजड़ी महानगरीय संस्कृतियों से हम क्या सबक लें ? जब से हमारी सिन्धु संस्कृति विलुप्त हुयी है, इस उपमहाद्वीप में और संसार में अन्य स्थानों पर भी, भाषा सार्वभौम बनती गयी है | यह भी सिद्ध नहीं होताकि मंत्रोच्चार के बिना हमारा जन्म हुआ है और भाषिक मंत्रो के बिना विवाह भी सामाजिक संस्था नहीं बनती है | और तो और अंतिम संस्कार के मन्त्र बुदबुदाए बिना हम भूत-प्रेत ही बनाने वाले होते हैं | इस प्रकार, श्रम को केंद्र में रखकर प्राकृतिक फसलों द्वारा पृथ्वी की शान बढ़ाने वाली आत्ममग्न स्वायत्त कृषि-संस्कृति धीरे-धीरे परावलम्बी बनती गयी | इसके विपरीत | इसके विपरीत भाषा को केंद्र में रखकर शोषण करने वाली नगरीय मुफ्तखोर, औद्योगिक, व्यापारीय, कोयला- पेट्रोलादि शोषण संस्कृति की – जमीन में धंसी जड़ें नष्ट – इलेक्ट्रानिक – वैश्वीकरण – जीने की सामर्थ्य ...|” क्या बकवास है ? अचानक शोरगुल | कौन है ये ? कहाँ से आया है ? (p. 8) दरअसल, विद्वत समाज में यह शोरगुल, यह खलबली इसलिए कि, अपने आलेख में खंडेराव अब तक की ओरिएण्टल थीसिस को चुनौती देता है |
आधुनिकता की तथाकथित विकसित और प्रगत पाश्चात्य धारणा और विचार के विरुद्ध नेमाड़े स्थानीयता और देशजता की बहुरंगी सांस्कृतिक विरासत को बनाये बचाए रखने के हिमायती हैं | वे इस उपन्यास में डार्विनवादी प्रगति की अवधारणा की असहमति में तर्क रखते हैं |  ‘यूज़ एंड थ्रो’ वाली आधुनिक पाश्चात्य-सभ्यता के प्रतिरोध में हिन्दू-धर्म और भारतीयता को; उसकी सामुदायिकता, सहयोगी सहजीविता और सामाजिकता की प्रकृति में सबकुछ को संजोने और स्मृति में जीने के मूल आचरण के साथ प्रस्तुत करते हैं | पुरात्तव की शोध-छात्र, संस्कृति और इतिहास के पाश्चात्य पंडित ए. एल. बाशम की शिष्या मंडी अंडमान-निकोबार की जनजातियों से लेकर मराठवाड़ा के मोरगाँव तक के लोगों के बीच बिताए अपने अनुभवों को खंडेराव के साथ साझा करते हुए खुद से ही जैसे प्रश्न  करती है – “ये देहात ऐसे ही निष्पाप, सादगी और उदारमना रहेंगे ?” फिर मंडी के रूप में जैसे नेमाड़े खुद ही जवाब देते हैं “रहेंगे, जरूर रहेंगे | हिंदू लोग कुछ भी फेंक नहीं देते | सिन्धु काल से लेकर सारा कबाड़ हमने तहखाने में ठूँस-ठूँस कर संभाल रखा है | सबकुछ वहीं कहीं अँधेरे में रखा होता है | भले ही वह दिखाई न दे, गुम हो जाय स्मृति से भी चला जाय कुछ नहीं बिगड़ेगा | कभी न कभी मिल ही जाएगा | सिन्धु धर्म है, बैध धर्म है, वैदिक ब्राह्मण भी है | पीपल के निचे का बरुआ है | दिवाली के पटेर के गट्ठर हैं | सेहरे हैं और लाभानों के नाम – हरखू, शरयू नदी का अफगान-पश्तू नाम है | खरखोती सरस्वती का पश्तू रूप | इतने से मोरगाँव में 8 धर्म, सम्प्रदाय और 22 जातियाँ आज भी हैं | जीवन भर शाकाहार, अहिंसा – एक जीवन पद्धति है | बाहर का स्पर्श टालने के लिए घोंघे जैसे स्वयं के शरीर को ही अपना घर क्यों न बनाएँ ? कैसे मानें कि, अंदमानी, निकोबारी, भील, गोंड, लद्दाखी, तिब्बती ये हज़ारों जन-जातियां पिछड़ी हुयी हैं ? किसने तय किया ? जबतक हिकारत करने वाला नहीं होता तबतक हीनता भी नहीं होती | यह किसने और किस आधार पर तय किया कि शोषण करने वाले ही प्रगत हैं ? (p. 29). इन पंक्तियों को पढ़ते हुए एकबारगी आपको रेणु के  ‘मैला आँचल’ की याद आ सकती है | उपन्यास के पांचवें खंड में मंडी अंडमान-निकोबार की ‘औंग जनजाति’ के बीच बिताये अपने दिनों की स्मृति साझा करते हुए यह बताती है कि, कैसे पूरी तरह निर्वस्त्र रहने वाले लोगों के बीच वह भी पूरी तरह नंगी होकर रही | “ अरे उनके बच्चे यहाँ-वहाँ उंगली लगा कर यह देखते कि मैंने कहीं अन्दर काली चमड़ी तो नहीं छिपाई है, फिर सभी हँसते |” (p. 488). ऐसे ही एक प्रसंग का उल्लेख मंडी करती है,  जो स्त्री-पुरुष के रिश्तों और काम-वर्जनाओं के नियम क़ानून को चिंदी-चिंदी हवा में उड़ा देता है –“ एक द्वीप पर एक छोटा सा बच्चा एक जवान आदमी से हमेशा चिपका रहता था | मैंने उन्हीं की भाषा में पूछा, यह कौन है ? निकोबारी बोला, मेरी बीवी का लड़का |... मतलब ? तेरा नहीं ?... नहीं मेरी बीवी का |... ऐसा कैसे ? इस पर वह झल्लाकर बोला, तुम औरतों को समझ में आना चाहिए, मेरी बीवी को मेरे आलावा क्या किसी दूसरे से बच्चा नहीं हो सकता ?... आश्चर्य | अरे, इंग्लैण्ड में कोई ऐसा पति सोच भी नहीं सकता |” (p. 488-89).
हिन्दू धर्म में स्त्रियों के लिए अलग-अलग विधि-विधान, नियम कायदे, अधिकार और वर्जनाओं के भिन्न-भिन्न वर्जन (version) मिलते हैं | इनके अनुसार उनकी कोटियाँ, उनका वर्ग, इनकी पहचान निर्धारित होती है | भालचंद्र नेमाड़े को शोषण के इन बहुस्तरीय सामाजिक-सांस्कृतिक परतों का जो ज्ञान है वह केवल दिलचस्पी नहीं पैदा करता वरन् उस पूरी सांस्कृतिक-संरचना की उनकी समझ को दर्शाता है जो समाज में भेद-विभेद को सदियों से कायम और बरकरार रखे हुए हैं – “बेटी, बहू, देवरानी, माँ, दादी, परदादी, सास, ददिया सास, बुआ, ननद, भौजाई, जचगी के लिए मायके आयी हुयी स्त्री, ससुराल छोड़कर मायके में ही आकर रहने वाली चिंधु बुआ सरीखी स्त्री, ब्याह कर लाने के बाद छोड़ डी गयी स्त्री, केवल लडको की माँ, केवल लड़कियों की माँ, सौतेले बच्चों के साथ रहने वाली पाटवाली (पुनर्विवाहित) स्त्री, बाँझ स्त्री, जवानी में विधवा हुयी बूढ़ी स्त्री, विधवा माँ, संतानहीन विधवा, सौतन, सौतेली माँ, कुलटा, रखैल, दासी | एक विशाल स्त्री विश्व |” (p. 233) इस तरह के ब्यौरों से लग सकता है कि उपन्यासकार ने अपनी बहुज्ञता का रौब गांठने के लिए इन्हें शामिल किया है | ऊपरी तौर पर इससे एक बार सहमत हुआ जा सकता है; परन्तु सांस्कृतिक और सामजिक निर्माण की प्रक्रिया में रखकर इस तरह के वर्णनों को आप समझना शुरू करेंगे तो ये ब्यौरे मात्र सूचनात्मक (informative) न होकर उस आचरण-शास्त्र (deontology) के महत्व के होंगे जिन्हें समाजविज्ञानी सामाजिक-व्यवस्था (social-order) और सामाजिक-निर्मिति (social-construct) की विश्लेषण-प्रक्रिया में प्रयुक्त करते हैं | इस उपन्यास में, नेमाड़े इस तरह के बहुविध सामजिक-सांस्कृतिक विन्यासों और परतों को बहुत विस्तृत और  और गहरी समझ के साथ ‘भारतीयता’ की मूल रहन और स्वभाव के विपरीत विकसित और धीरे-धीरे वैध बना दी जाने वाली ब्राह्मणवादी हिन्दू धारणाओं, मान्यताओं और रूढ़ियों का प्रतिरोधी पाठ तैयार करते हैं | ‘‘हिन्दू’ ! बहुवचन भूतकाल ! पाँच हज़ार सालों की धूल !” (p. 15).

‘हिंदू’ एक ऐसा आख्यान है जिसमें ‘नॉन आर्यन’ और ‘प्री-आर्यन’ जीवन-व्यवहारों और सामाजिक-सांकृतिक रहन को गहराई तक जानने समझने की कोशिश दिखती है | अपनी मूल समग्रता में भारतीयता को देखने, उसके हजारों सामाजिक-सांस्कृतिक रीतियों-व्यवहारों को समझने के कारण यह उपन्यास एक ऐसा आख्यान बन जाता है जो उन सभी तरह के आधुनिक, उत्तर-आधुनिक, औपनिवेशिक, उत्तर-औपनिवेशिक चालाकियों और छद्मों को तोड़ता है | इतिहास का अंत, आख्यान का अंत, स्मृति का अंत, लोकेल को ग्लोबल बनाने की चालाक बाजारू कोशिशें इन सबका प्रत्याख्यान रचता है यह उपन्यास | भूमंडलीय पूंजीवाद में आख्यान, स्मृति, जातीयता इन सबको धीरे-धीरे विस्मृत कर ख़त्म कर देने की जो योजना है ऐसे उपन्यास उनकी इस योजना के विरुद्ध एक प्रतिरोधी रचनात्मक हथियार की तरह होते हैं | कोलंबिया यूनिवर्सिटी में मानविकी के प्रोफेसर कार्ल क्रोएबर ने अपनी पुस्तक – ‘ Retailing/Rereading : The  fate of story tailing in modern times’ में ‘आख्यान’ विशेषता, उसकी प्रकृति और उसके सामाजिक महत्व पर बहुत ही विस्तार से विचार किया है | इस पुस्तक में क्रोयेबर का इस बात पर विशेष जोर है कि, आख्यान एक सामजिक अंतःक्रिया है | वह कभी भी शुद्ध कला नहीं हो सकता | वे लिखते हैं – “आख्यान अपनी प्रकृति और स्वाभाव में अक्सर स्थापित सत्ता को चुनौती देता है | इसलिए, स्थापित सत्ताएं आख्यान की इस स्वतंत्रता को कम या अपने हित में नियंत्रित करने के प्रयास करती हैं | ‘शुद्ध कला’ की बात या मांग करना भी ऐसा ही एक प्रयास है | लेकिन आख्यान कभी ‘शुद्ध-कला’ नहीं हो सकता, क्योंकि, कहानी कहना एक सामाजिक कार्यवाई है, जिसमें कहने वाले के साथ-साथ सुनने वाले (और पढने वाले) भी सक्रिय हिस्सेदारी करते हैं | इस अर्थ में आख्यान अन्तर्निहित रूप से अशुद्ध होता है और परस्परता उसकी जरूरत होती है | इसलिए वह दैनंदिन जीवन के भारी विभ्रमों में उलझे हुए विषयों से जी नहीं चुराता और उसमें ‘लोकप्रिय’ साहित्य के फलने-फूलने की प्रवृत्ति होती है | इसलिए, अपने कला-कौशल पर इतराते हुए भी वह आसानी से वैसे शुद्ध सौन्दर्यशास्त्रीय वास्तु नहीं बनता जैसी बहुत से आधुनिकतावादी उसे बनाना चाहते हैं |”[3]

सामजिक-अंतःक्रिया ‘हिन्दू’ उपन्यास की रचनात्मक-धारणा में अन्तर्निहित है, उसके समूचे कथानक में विन्यस्त है | यह उपन्यास एकवाचिकता का उपन्यास नहीं है बल्कि बहुवाचिकता और बहुवचनात्मकता इसकी विशेषता है | कई-कए कथा धाराएँ उपन्यासकार के अनुभव जगत से निःसृत हुयी हैं | भारतीयता, हिन्दू कौन, स्त्री की दुरावस्था, दलित समाजों की अवस्था आदि कई कथाएँ-उपकथाएँ एक ही कथानक में साथ- साथ चलती हैं | वस्तुतः उपन्यास, मात्र स्थितियों-परिस्थितियों, भावों-मनोभावों, घातों-प्रतिघातों का संयोजन और कलात्मक निर्वाह भर नहीं है जो किसी एकरेखीय संभावना में निष्पन्न हो | उपन्यास ऐतिहासिक-सामाजिक शक्तियों के संघर्ष और गतिशीलता में से निःसृत मनुष्य की नियति का अनेकवाची साहित्य-रूप है | ऐसे में उपन्यास का अपना एक ‘देश’ होता है और एक ‘काल’ होता है | इस ‘देश- काल’ के नागरिकों (चरित्रों) की रचना उपन्यासकार सामाजिक और ऐतिहासिक संदर्भों और जरूरतों के अनुकूल करता है | दरअसल, उपन्यास अपनी आख्यानात्मकता में समयातीत होते हुए भी कालातीत नहीं होता उसकी दृष्टि समकालीनता की दृष्टि होगी | ‘समकालीनता’ का यह बोध ही उस ‘इतिहास-बोध’ का विवेक है जिसे मनुष्य अपने ‘सामाजिक’ होने की प्रक्रिया में प्राप्त करता है | मनुष्य किसी न किसी ‘देश-काल’ में अवस्थित होता है, ‘इतिहास-चेतना’ के आयामों में ही वह परिभाषित और व्याख्यायित होता है | इसलिए, जिस तरह मनुष्य ‘देश-काल’ से विच्छिन नहीं हो सकता उसी तरह उपन्यास भी ‘देश-काल’ शून्य नहीं हो सकता | उपन्यासकार, कथानक के बीच ही इस ‘देश-काल’ की व्याख्या के लिए यथाप्रसंग अवसर उपस्थित कर ही लेता है | इस उपन्यास में ‘दलित समाज ’ का जो चित्रण है वह इसी तरह के देश-काल की व्याख्या के प्रसंग में आया है – “14 अप्रैल सन् 1956 को दशहरे के दिन नागपुर में इकट्ठे 15 लाख लोग बाबा साहेब आंबेडकर के प्रभाव में बौद्ध धर्म ग्रहण कर लेते हैं | मोरागाँव में भी महार नेता लहू मेघे के नेतृत्व में केवल चार घरों को छोड़कर सभी ने बौध धर्म स्वीकार कर लिया |  “तुम बौद्ध धर्म का कुछ पढ़ते हो ? ...बौद्ध धर्म में ऐसा कुछ नहीं होता | पूरण, ईश्वर, आत्मा, स्वर्ग, नरक जैसी अंध श्रद्धाएँ हम नहीं मानते |... बढ़िया | लेकिन बौद्ध धर्म में तो हिंदू धर्म से भी ज्यादा साहित्य है |... अच्छा ?... हाँ, पाली में |... यहाँ कौन जानता है पाली या फाली | शोषण करने वाला, इंसानियत से बर्ताव न करने वाला हिन्दू धर्म छूट गया, बहुत है यार |”...जय भीम | (p. 140) इस पर यह आक्षेप और तर्क कि बाबासाहेब आंबेडकर ने हिन्दू समाज को तोड़ दिया | खंडेराव मन ही मन इस पर सोचता है, हिन्दू धर्म हमेशा से समन्वय की, जोड़ने की बात करता है | पर क्या यह समन्वय उन असंख्य जातियों और अनेकों धर्मों के लोगों के आत्मसम्मान और जातीय अधिकारों के साथ, उनके जीवन और धर्म की जरूरतों के हिसाब से हुआ या है ? अगर ऐसा होता तो इसकी जरूरत ही कहाँ पड़ती – “जोड़ने की चाहत रखने वाले महात्मा गांधी ही इस फटे समाज को कहाँ जोड़ पाए |... हिन्दू समाज को तोड़ने वाले बाबासाहेब आंबेडकर ही अछूतों को आज़ाद करते हैं | जोड़ने वाले तो बस सब्र कि बात किया करते हैं | तोड़ने वाले परिवर्तन कर के दिखाते हैं | दीन-दलितों को शूद्र-वंचितों को आत्मसम्मान देते हैं | खंडेराव तुम इस पाखंडी एकता के पक्ष में कभी खड़े मत होना | हमेशा तोड़ने वालों के पक्ष में खड़े रहना |” (p.143) ऐसे उपन्यासों में प्रायः कथा तो होती है पर कथानक क्षीण हो जाता है | नेमाड़े की खासियत यह है कि, वे कई कथाओं-उपकथाओं के साथ कथानक से विचलित नहीं होते, लक्ष्य से दिग्भ्रमित नहीं होते | कथावस्तु की सोद्देश्यता को निरंतर बनाये रखते हैं | यह उपन्यास अपनी अनेक-वाचिकता के साथ जिस एक कथानक को बनाये-बचाए रखता है वह है भारतीय समाज की अनेकवाची बहुवचनात्मक जातीय सांस्कृतिक रचना और अधिरचना को बरकरार रखते हुए उसकी पहचान को कायम रखा जाय | यदि, उपन्यासकार का अनुभव-जगत समृद्ध है और भाव-बुद्धि समकाल के प्रति सजग और संवेदी है तो कथानक के क्षीण होने, टूट जाने या बिखर जाने की समस्या नहीं रहती | इस सम्बन्ध में नित्यानद तिवारी का यह कथन देखना चाहिए – “कथानक कहानी का सिर्फ ढांचा नहीं है, वह लेखक के अनुभव में वस्तुगत वास्तविकता की अनिवार्य आंच और निशान का प्रमाण होता है और बिना सूक्ष्म भाषिक और तकनीकी योग्यता के भी सच्चे साहित्य की शर्तें पूरी कर सकता है | कई बार ऐसा होता है कि, शिल्प, तकनीकी और भाषा की योग्यता से प्रभाव को घनीभूत किया जा सकता है, असलियत नहीं पैदा की जा सकती | कथानक वास्तविकता का साक्षात्कार है लेखक की सृष्टि नहीं |”[4] दरअसल, उपन्यासकार की चेतना अपने अनुभव और विवेक से अपने औपन्यासिक चरित्रों और कथावस्तुओं का निर्माण करती है और उन्हीं में अपना देश-काल ढूँढती है | उन्हें पा लेना ही उपन्यासकार की कलात्मक उपलब्धि है |
उपन्यास में जो सूचनापरक वर्णनात्मकता है उसे जीवन के खिलंदडेपन के साथ-साथ भाषा-सामाजिकी की दृष्टि से भी देखने की जरूरत है | उस ‘टेक्स्ट’ के ‘टेक्सचर’ को बहुत ध्यान से पढ़ने की जरूरत है | नेमाड़े न जाने कहाँ से सामजिक-परतों के इतने बहुरंगी चित्र ले आते हैं जिससे जीवन-परिस्थितियां अपने वास्तविक प्रामाणिकता के साथ सजीव हो उठती हैं | मराठवाड़ा की कृषि और श्रम-संस्कृति में एक स्त्री के लिए शुरू होने वाले दिन के इन ब्यौरों को पढ़ते हुए आप उस वास्तविकता से परिचित होते हैं- “भोर में सास द्वारा निकालकर रखे पिसान की आवाज से दिन का प्रारम्भ इधर पति नहीं छोड़ता और उधर सुबह के कामों की कतार – जांता, मथानी, मूसल, झाडू, राख, गोबर पोतना, चूल्हा, ओखली, कलेवा की रोटी, खेत पर ले जाने का दोपहर का खाना, नहाना-धोना, बर्तन, गाय,-भैंस, जलावन, अधूरी नींद से आयी सुस्ती, संभलते हुए पानी भरना, दूध गर्म करना, ज़माना, बच्चों का पिनपिनाना, सुबह से एक के बाद एक भीख मांगने आने वाले – वासुदेव, गोंधाली, नंदीबैल वाले, भडंग वाले, तिरमल, बैरागी, नाथ, मलंग, गोसाईं, सन्यासी, लंगड़े-लूले, भविष्य बताने वाले जोशी, पांचांग बताने वाले ब्राहमण, साधु-जोगी  वगैरह-वगैरह | बड़े कुर्मी का गृहस्थी मतलब इन सबका अपना घर | फिर शाम को पौनी, भिखारी, भैंस के लिए सानी, गाय का दाना-पानी, फिर पच्चीस लोगों के लिए खाना पकाना | कहना चाहे जितना सादा – पतीली भर तरकारी और चंगेरी भर रोटियां ही क्यों न हो फिर भी शरीर को  दिन भर प्रकृति के साथ लोहा लेने की ऊर्जा देने वाला और सालदारों समेत  सभी के लिए भर पेट होना ही चाहिए | चंगेरी से जब अआखिरी रोटी भी जब खाने वाले उठा लेते हैं, तब दुबारा चूल्हे पर तवा डालकर रोटियां बनाने उठाना ही पड़ता है | दिन भर ये औरतें मानो भरतनाट्यम की अलग-अलग मुद्राएँ करती रहती हैं | उंगलियाँ, अंगूठे, गर्दन, कंधा, हाथ, कलाई, जंघा, पैर, कमर – कितनी मुद्राएँ ? हवा में , जमीन से झुककर, उठकर, बैठकर, चूल्हे के आगे भी डोलना, बेलना, थापना, पकाना, चालना, फटकना,चुनना ... इस आदिम नारी-नृत्य के ताल पर ही तो सारी कृषि-संस्कृति दस हज़ार सालों से डोलती आ रही है |” (p. 187). इस उद्धरण में स्मृति के आधार पर एक के बाद एक चीजों, भावों, मुद्राओं आदि का जो वर्णन है वह क्या केवल सूचनात्मक है ? क्या वह आज की सूचना-क्रांति और उत्तर-उपनिवेशवादी संरचना को ठेंगा नहीं दिखा रहा ? आंकड़ों, तथ्यों के गुणा-गणित के सामानंतर रोजमर्रा के जीवन का सहज-जीवंत किन्तु सोच-विचार में डालने वाला वर्णन | इसी वर्णात्मक-प्रकृति के क्रम में  हमें, उपन्यास में नेमाड़े की वर्नाक्युलर्स के प्रति जो विचार और धारणा है, अंग्रेजी और अंग्रेजियत की प्रभुता वाली जो साम्राज्यवादी धारणा है उसके विरूद्ध  नेमाड़े की दृष्टि को भी देखना चाहिए | वे, संस्कृतनिष्ठता का त्याग कर रोजमर्रा के बोली-व्यवहार को जगह देते हैं | उपन्यास में वे जगह-जगह देशज शब्दों के साथ लोकोक्तियों, मुहावरों का प्रयोग करते हैं | स्थानीय महापुरुषों, कबीर, तुकाराम, नामदेव, ग़ालिब, आदि  को उद्धृत करते हैं | कई पात्रों के नाम बहुत ही चुहल भरे हैं, जैसे – शेखीबघारे पाटील, डींगमारे देशमुख | अपनी खांटी देशजता और स्थानीयता में चुहलबाजी के समय कई जगह इस तरह की भाषा भदेस भी हो जाती है परन्तु वह संदर्भ से च्युत होकर नहीं है | उपन्यास के अंतिम हिस्से छठे खंड में भुसावल स्टेशन से अपने गाँव जाने के लिए खंडेराव बैलगाड़ी का सफर कर रहा होता है | रास्ते में एक स्कूल के मास्टर जी भी चिरौरी कर गाड़ी में बैठ जाते हैं | गाड़ी हांकने वाला नवयुवक तिरमक (त्र्यम्बक का बिगड़ा रूप) और गुरुजी में बातचीत शुरू होती है | गुरुजी पूछते हैं कि तुम पढ़ाई-लिखाई क्यों नहीं करते | जवाब की भाषा देखिए – “गुर्जी, पढ़ाई में अव्वल था मैं स्कूल में | लेकिन क्या करें किस्मत ही हमारी ऐसी गांडू – साली ने बैलों का चूतड़ दिखा दिया | हमारा बाप – पीताजी | दिन-रात शराब पीता था | पट्ठे ने मुझसे पूछे बिना चौथी कक्षा से मेरा नाम कटा लिया स्कूल से और गोत-बस्ती के भोंग्य बनिए के पास होटल में पकौड़े तलने के लिए रख दिया, दो रुपये रोज़ पर – उसका शराब का खर्च निकल गया न |” (p.507). अनेकों जगहों पर पात्र अंगरेजी के शब्दों को तोड़-मरोड़कर उसका स्थानीय अर्थ लगाकर मजा लेते हैं, हँसी- ठट्ठा करते हैं | ‘ससुरा’ ‘सिसरो’ है, ‘मोटेल’ मोटा होना (मुटल्ला) है | इसके उलट भी होता है | संस्कृत शब्दों के साथ भी शब्द-क्रीड़ा कर मजा लिया जाता है | स्वतंत्रता-दिवस के दिन ‘वन्दे मातरम्’ ‘वन-डे मातरम्’ हो जाता है | यह भाषिक-देसीपन यूँ ही नहीं है एक वैचारिक निर्मिति का हिस्सा बनकर आता है | नेमाड़े ने इसे हर तरह की  साम्रज्यवादी और रोमानियत के खिलाफ जानबूझकर रचा है |
उपन्यास का ढाँचा ऐसा होता है कि, इसमें जीवन के सभी प्रकार के जटिल और विस्तृत संबंधों व परिस्थितियों को चित्रित किया जा सकता है | साहित्यिक विधाओं में देखा जाय तो उपन्यास सामाजिक और ऐतिहासिक अंतर्विरोधों का सूत्रीकरण करने वाली सबसे सशक्त और कारगर विधा है | उपन्यास ही है जो, मनुष्य, समाज और ‘व्यक्ति’ के अंतर्द्वंद्वों और अंतर्विरोधों के साथ उसके आपसी रिश्ते को सम्पूर्णता में पकड़ने और अभिव्यक्त करने का दावा करता है और एक हद तक अभिव्यक्त भी करता है | यहीं आकर उपन्यास केवल ‘लिटरेरी कंस्ट्रक्ट’ या साहित्यिक संरचना मात्र नहीं रह जाता वरन एक ‘सोशल कंस्ट्रक्ट’ बन जाता है |
यह उपन्यास खंडेराव के रूप में भालचंद्र नेमाड़े की एक अंतर्यात्रा है | जो पूरी होकर भी पूरी नहीं होती | ताप्ति से सिन्धु तक, सिन्धु से ताप्ति तक, मोरगाँव से मोहेनजो-दड़ो तक, मोहेनजो-दड़ो से मोरगाँव तक की पाँच हज़ार साल की अपनी यात्रा में खंडेराव विट्ठल अतीत से वर्तमान की, वर्तमान से अतीत की, स्मृति से अनुभव की, अनुभव से स्मृति की, स्वप्न से चेतन की, चेतन से स्वप्न की, ज्ञान से संवेदन की, संवेदन से ज्ञान के न जाने कितने चक्र पूरे करता है | पिता की मृत्यु पर लौट कर मोरगांव आता है | क्रिया-कर्म कर के छूटना चाहता है | पी-एच.डी. पूरी कर ‘उत्क्रांति’ करना चाहता है | पर क्या छूट पाता है -
मैंने चाहा था के अन्दोह - ए - वफ़ा से छूटूं,
वो सितमगर मेरे मरने पे भी राज़ी न हुआ |
(ग़ालिब)
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[1] (उपन्यास के आवरण-पीठ से उद्धृत)
[2] भालचंद्र नेमाड़े को 2014 का भारतीय ज्ञानपीठ मिलने पर उनके सम्मान में ‘मातृभाषा संवर्धन सभा’ सभा द्वारा मुम्बई में आयोजित कार्यक्रम में बोलते हुए नेमाड़े ने कहा “ Mr. Rushdie and Mr. Naipaul, both are pandering to the west.” उनके इस आलोचना पर पलट वार करते हुए सलमान रुश्दी ने ट्विट किया “Grumpy old… Just take your prize and say thank you nicely. I doubt you’ve even read the work you attack.
[3] देखिए, भूमंडलीय यथार्थवाद की पृष्ठभूमि – रमेश उपाध्याय, शब्दसंधान प्रकाशन, नयी दिल्ली (p. 166).
[4] आधुनिक साहित्य और इतिहासबोध – नित्यानंद तिवारी, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, (p. 91-92)

16 नवंबर 2015

संपादकीय / पक्षधर-18



                   

                जीवित आवाजों के हक़ में  


         विनोद तिवारी 


 सांस्कृतिक मोर्चे पर एकमात्र संभव युद्ध, जिससे हमें जूझना है; वह है दो संस्कृतियों – पूरब (समाजवादी पूर्वी यूरोप) और पश्चिम (पूँजीवादी पश्चिमी यूरोप) – के शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के लिए युद्ध | मेरे कहने का मतलब यह नहीं है कि ये दोनों एक दूसरे की गलबहियाँ करते हुए परस्पर एक दूसरे में समा जायँ | मैं बखूबी जानता हूँ कि इन दो संस्कृतियों के आमने-सामने होने का मतलब है द्वंद्व और संघर्ष, परन्तु यह द्वंद्व और संघर्ष केवल व्यक्तियों और उन संस्कृतियों के बीच हो, उसमें किसी भी तरह से किसी भी सांस्थानिक मशीनरी का हस्तक्षेप न हो | मैं स्वयं इन दो संस्कृतियों के पारस्परिक अंतर्विरोध से गहरे प्रभावित रहा हूँ | इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि ये अंतर्विरोध मेरी बुनावट में अनुस्यूत हैं | मेरा जन्म और मेरा पालन-पोषण बुर्जुवा परिवार और बुर्जुवा संस्कृति में हुआ बावजूद इसके मेरी सहानुभूति, मेरा समर्थन समाजवाद के साथ है | एक विश्व नागरिक होने के नाते मैं ऐसे लोगों का सहयोग करने का अधिकार रखता हूँ जो दोनों संस्कृतियों को एक दूसरे के निकट लाने के प्रयास में सन्नद्ध हैं | - ज्याँ पॉल सार्त्र, 1964

अधिकांश एंग्लो-इंडियन अखबारों ने इस क्रूरता की तारीफ़ की है | इनमें से कुछ तो हमारी यातनाओं की खिल्ली उड़ाने में पाशविकता की सीमा तक चले गए | इन पर अधिकारियों ने किसी भी तरह की रोक लगाने की कोई कोशिश नहीं की और न ही उसकी जरूरत समझी | हम जान चुके हैं कि, हमारी प्रार्थनाएँ व्यर्थ सिद्ध हो चुकी हैं और यह भी कि हमारी सरकार में – जो अपनी विशाल भौतिक-शक्ति और अपनी उच्च नैतिक परम्पराओं के अनुरूप उदारता का परिचय दे सकती है – राजधर्म के भव्य आदर्श की बजाय प्रतिशोध की भावना उग्र हो रही है | ऐसे में मेरा न्यूनतम धर्म है कि मैं आतंक और भय से चकित और गूंगे हो चुके अपने लाखों-लाख देशवासियों के प्रतिरोध को स्वर देने के सारे परिणामों को अपने ऊपर लेने के लिए प्रस्तुत हो जाऊं | - गुरुदेव रबीन्द्र नाथ टैगोर, 1919
उपर्युक्त दोनों उद्धरण अपने समय के दो लेखकों और चिंतकों की पीड़ा और क्षोभ को दर्शाते हैं | पहला उद्धरण ज्याँ पॉल सार्त्र के उस पत्र का अंश है जो 1964 में उन्होंने साहित्य का नोबेल ठुकराते हुए ‘स्वीडिश अकादेमी’ को लिखा था जो बाद में फ़्रांस के सांध्य दैनिक ‘ले मॉन्दे’ (Le Monde) में में प्रकाशित हुआ | दूसरा उद्धरण गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा किंग जार्ज पंचम को लिखे गए उस पत्र का अंश है जो उन्होंने जलियाँवाला बाग़ की नृशंसता के प्रतिरोध में अपना ‘नाइटहुड’ सम्मान लौटाते हुए लिखा था | अखिल भारतीय स्तर पर एक-एक कर बड़ी तादाद में साहित्य अकादेमी पुरस्कार लौटाने और साहित्य अकादेमी की विभिन्न समितियों की सदस्यता से त्यागपत्र देने की लेखकों और बुद्धिजीवियों की सामूहिक मानसिकता को महज एक तात्कालिक क्षोभ या प्रतिक्रियात्मक व्यवहार के रूप में देखना दरअसल बालोचित  हताशा का प्रतीक है, जिसमें यह धारणा अन्तर्निहित होती है कि, मुझे जो गुब्बारा चाहिए वह क्यों नहीं मिल रहा, रोने-गाने के बाद वह अगर मिल भी गया तो उत्साह में उसमें इतनी हवा भर दी गयी कि वह फट कर चिंदी-चिंदी हो गया | फिर क्या, हताशा ही हाथ लगेगी | इस हताशा का ही परिणाम है कि, लेखकों की राजनीतिक पक्षधरता और विचारधारा को टोहा जा रहा है | विवेकहीन हताशा की प्रतिक्रिया में बिना सोचे- समझे एक लेखक को उसकी राजनीतिक पक्षधरता और विचारधारा में टोहना; निहायत ही गलत ढंग से और गलत मंतव्यों में टोहना है | क्या लेखक की प्रतिबद्धता के सन्दर्भ में लेखक होने की ही प्रतिबद्धता को पर्याय मानना पर्याप्त नहीं होगा | यह बात समझनी चाहिए कि एक लेखक अपनी आत्मवत्ता में मानवीय-गरिमा के साथ सामाजिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय नैतिकता का नागरिक पहले होता है विचारधारा उसकी इस नागरिकता को सान देती है,परिभाषित नहीं करती | जिस लेखक में इस नैतिक और वैचारिक आत्मवत्ता का तिरोभाव हो जाता है, वह व्यवस्था के भीतर भी लेखकीय गरिमा के विरुद्ध आचरण करेगा और बाहर भी | व्यवस्था के भीतर रहती हुए साहित्येतर सुविधाओं के चलते वह अहमन्य और भीरु होता जाएगा और बाहर की जवाबदेहियों और दायित्वों के प्रति जोख़िम से गुजरने की स्थिति आने पर अंततः या तो व्यवस्था के भीतर ही शरण प्राप्त कर लेगा या उपर्युक्त हताशा और कुंठा की मारकता का आखेट बनकर रह जाएगा | साहित्य अकादेमी क्या इस तरह का आखेट बनने के लिए प्रस्तुत है | पुरस्कार वापसी कर विरोध दर्ज करना साहित्य आकादेमी का विरोध दर्ज करना भर नहीं है बल्कि पिछले डेढ़ साल में हिंदुत्व के नाम पर असहिष्णु कट्टरता का जो माहौल बनाया जा रहा है, लेखकों, बुद्धिजीवियों, समाज-चिंतकों, इतिहासकारों, समाज-वैज्ञानिकों की अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता को जिस ढंग से भयग्रस्त किया जा रहा है यह प्रतिरोध इस वातावरण के खिलाफ है जिसके लिए साहित्य अकादेमी को लेखकों ने अपना मंच बनाया है, जो कि प्रतीकात्मक भी है | आखिर साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित कन्नड़ लेखक प्रो. एम. कुलबुर्गी की हत्या पर साहित्य अकादेमी एक निंदनीय शोक प्रस्ताव जारी करने की भी मोहताज क्यों हो गयी | वैधानिक दृष्टि से तो साहित्य अकादेमी एक स्वायत्त संस्था है | तो क्या अब अन्य विश्वासों और धारणाओं की तरह ‘स्वायत्तता’ ने भी अपना अर्थ खो दिया है ? अगर नहीं तो फिर साहित्य अकादेमी अध्यक्ष के सामने किस तरह की साँसत थी | वर्तमान सरकार की कार्य-संस्कृति से उनकी यह साँसत समझ में आती है |? विलम्ब से जो कुछ साहित्य अकादेमी ने किया तब तक उसकी संदिग्धता जाहिर हो चुकी थी | प्रसंगतः असद जैदी की एक कविता ‘दूरभाष’, ख्याल में उतर आयी | इस कविता में वे कई तरह से साहित्य अकादेमी की गतिविधियों का एक बहुत ही मौजूं चित्र प्रस्तुत करते हैं | वर्तमान सन्दर्भ में इसी कविता की कुछ पंक्तियाँ :
देखिए हिंदुत्व की परिभाषा अकादेमी ने नहीं
उच्चतम न्यायलय ने तय की है
हम तो पालन के दोषी हैं
और अगर हम ऐसा बहुत लम्बे समय से
करते चले आ रहे हैं
तो इसे गफलत नहीं, दूरंदेशी समझना चाहिए |

                                                – सामान की तलाश

साहित्य अकादेमी कई बार अन्य कई कारणों से विवाद में आती रही है पर साहित्य अकादेमी के इतिहास में उसकी स्वात्तता इतनी अधिक प्रभावित कभी नहीं हुई, उसकी स्थापना से लेकर अबतक | 1952 में साहित्य अकादेमी की स्थापना हुई | दरअसल, आजादी के पूर्व ही राष्ट्रीय स्तर पर एक ऐसी संस्था के गठन की बात उठायी गयी जो साहित्य, संस्कृति और कलाओं का पोषण और संवर्द्धन कर सके | इस उद्देश्य से देश की ब्रिटिश सरकार के पास ‘रॉयल एशियाटिक सोसायटी ऑफ़ बंगाल’ ने एक प्रस्ताव बनाकर भेजा कि, भारत में साहित्‍य और संस्कृति की एक राष्‍ट्रीय संस्‍था की स्‍थापना की जाय | सन् 1944 में  भारत की ब्रिटिश सरकार ने ‘रॉयल एशियाटिक सोसायटी ऑफ़ बंगाल’ का यह प्रस्‍ताव सैद्धांतिक रूप से स्‍वीकार कर लिया कि रचनात्मक सृजन के सभी क्षेत्रों में सांस्‍कृतिक गतिविधियों को प्रोत्‍साहित करने के लिए एक ‘राष्‍ट्रीय सांस्‍कृतिक ट्रस्‍ट’ (National Cultural Trust) का गठन किया जाना चाहिए। इस ट्रस्‍ट के अंतर्गत तीन अकादमियाँ – ‘साहित्य अकादेमी’, ‘ललित कला अकादेमी’ और ‘संगीत और नाटक अकादेमी’ – गठित किये जाने का प्रस्ताव पास हुआ | परन्तु, ब्रिटिश सरकार ने इस प्रस्ताव को अमलीजामा नहीं पहनाया | स्‍वतंत्रता के बाद भारत की स्‍वतंत्र सरकार ने इस प्रस्‍ताव का अनुसरण करते हुए एक विस्‍तृत रूपरेखा तैयार करने के लिए कई नियमित बैठकें बुलायीं । इन बैठकों के परिणाम स्वरूप सर्वसम्‍मति से उपर्युक्त तीनों राष्‍ट्रीय अकादेमियों के गठन का प्रस्ताव पास हुआ | भारत सरकार के संकल्‍प सं. एफ-6-4/51 जी 2 (ए) दिनांक 15 दिसंबर, 1952 के द्वारा ‘नेशनल एकेडेमी ऑफ लैटर्स’ नामक राष्‍ट्रीय साहित्यिक संस्‍था की स्‍थापना का निर्णय पारित हुआ और यह कहा गया कि इसे ‘साहित्‍य अकादेमी’ के नाम से जाना जायेगा | साहित्य अकादेमी का विधिवत उद् घाटन भारत सरकार द्वारा 12 मार्च, 1954 को किया गया । हालाँकि, अकादेमी की स्थापना भारत सरकार द्वारा लाये गए प्रस्ताव के आधार पर की गई है फिर भी यह यह भारत सरकार का एक संवैधानिक निकाय नहीं है | यह एक स्वायत्तशासी संस्था के रूप में कार्य करती है जिसका पंजीकरण (7 जनवरी, 1956 को) ‘सोसायिटी पंजीकरण अधिनियम 1860’ के अंतर्गत हुआ है । प्रारंभ में साहित्य अकादेमी का कामकाज शिक्षा मंत्रालय में एक कमरे से चलता रहा | पर, इसके लिए अलग से एक बड़े कार्यालय की जरूरत महसूस की जा रही थी | अतः अप्रैल 1955 में साहित्य अकादेमी का सचिवालय कनॅाट प्लेस (नयी दिल्ली) में एक पुराने पड़े भवन ‘थियेटर कम्युनिकेशन बिल्डिंग’ में स्थानांतरित हुआ | गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर के जनशताब्दी-वर्ष 1961 में जब रबीन्द्र भवन बनकर तैयार हुआ तो साहित्य अकादेमी को स्थायी कार्यालय मिला | 35, फिरोजशाह रोड, नयी दिल्ली-110001 स्थित इस प्रधान कार्यालय के अतिरिक्त अकादेमी के चार क्षेत्रीय कार्यालय भी, कोल काता, चेन्नई (मद्रास), बम्बई और बेंगलुरु में स्थापित किये गए हैं | कोलकाता कार्यालय की स्थापना ‘नेशनल लाईब्रेरी, कोलकाता’ के परिसर में सन् 1956 में की गयी | अब 4, डी.एल. ख़ान रोड, (एस.एस.के.एम. अस्‍पताल के निकट), कोलकाता-700025 में स्थिति यह क्षेत्रीय कार्यालय असमिया, बाङ्ला, बोडो, मणिपुरी और ओडि़या में अकादेमी के प्रकाशन और कार्यक्रमों की देखरेख करता है। इसके अतिरिक्त अंग्रेजी और तिब्बती भाषा की कुछ पुस्तकें भी यहाँ से प्रकाशित होती हैं। यह अन्य उत्तर-पूर्वी भाषाओं में भी कार्यक्रमों का संयोजन करता है। चेन्नई कार्यालय की शुरुआत 1959 में हुयी | सन् 1990 में यह कार्यालय बेंगलूरु स्थानांतरित कर दिया गया | बेंगलुरु कार्यालय अंग्रेज़ी की कुछ पुस्‍तकों के अतिरिक्‍त कन्नड, मलयाळम्, तमिळ और तेलुगु में अकादेमी के प्रकाशन और कार्यक्रमों की देखरेख करता है। यह कार्यालय सेंट्रल कॉलेज परिसर में स्थित है। अब चेन्नई स्थित कार्यालय बेंगलूरु कार्यालय के कुछ कामों की देखरेख करता है। मुंबई कार्यालय की स्‍थापना सन् 1972 में हुई। यह कार्यालय हिन्दी और अंग्रेजी के कुछ प्रकाशनों सहित गुजराती, कोंकणी, मराठी और सिन्धी में अकादेमी के प्रकाशनों और कार्यक्रमों की देखरेख करता है। प्रधान कार्यालय के पुस्तकालय के अलावा सभी क्षेत्रीय कार्यालयों के अपने-अपने पुस्तकालय हैं | दिल्ली स्थित साहित्य अकादेमी का पुस्तकालय भारत के प्रमुख बहुभाषिक पुस्तकालयों में से एक है, यहाँ पर अकादेमी द्वारा मान्यता प्राप्त चौबीस भाषाओं के अतिरिक्त अंगरेजी की विविध साहित्यिक और संबद्ध विषयों की पुस्तकें उपलब्ध हैं। यह पुस्तकालय सर्जनात्‍मक कृतियों, समालोचनात्मक पुस्तकों, अनूदित कृतियों, संदर्भ ग्रंथों तथा शब्दकोशों के समृद्ध संग्रह के लिए जाना जाता है |
अकादेमी की प्रशासनिक और सांस्कृतिक क्रियाकलाप संबंधी दायित्वों का निर्वाह एक 99 सदस्यीय परिषद् (सामान्य परिषद्) करती है | इस ‘सामान्य परिषद्’ का गठन निम्नांकित ढंग से होता है - अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव, वित्तीय सलाहकार, भारत सरकार द्वारा मनोनीत पाँच सदस्य, भारत सरकार के राज्यों और केन्द्रशासित प्रदेशों के पैंतीस प्रतिनिधि, साहित्य अकादेमी द्वारा मान्यता प्राप्त भाषाओं के चौबीस प्रतिनिधि, भारत के विश्वविद्यालयों के बीस प्रतिनिधि, साहित्य-क्षेत्र में अपने उत्कर्ष के लिए परिषद् द्वारा निर्वाचित आठ व्यक्ति एवं संगीत नाटक अकादेमी, ललित कला अकादेमी, भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद्, भारतीय प्रकाशक संघ और राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन के एक-एक प्रतिनिधि। साहित्य अकादेमी की व्यापक नीति और उसके कार्यक्रम के मूलभूत सिद्धांत ‘सामान्य परिषद्’ द्वारा ही निर्धारित किए जाते हैं और उन्हें ‘कार्यकारी मंडल’ के प्रत्यक्ष निरीक्षण में क्रियान्वित किया जाता है। प्रत्येक भाषा के लिए ‘परामर्श मंडल’ हैं  जिसके सदस्य प्रसिद्ध लेखक और विद्वान होते हैं और उन्हीं के परामर्श पर तत्संबंधी भाषा का विशिष्ट कार्यक्रम नियोजित एवं कार्यान्वित होता है। परिषद् का कार्यकाल पाँच वर्ष का होता है।
भारत सरकार के जिस संकल्प-पत्र में अकादेमी का विधान निरूपित किया गया था, उसी में अकादेमी की यह परिभाषा दी गई है – “भारतीय साहित्य के सक्रिय विकास के लिए कार्य करनेवाली एक राष्ट्रीय संस्था, जिसका उद्देश्य उच्च साहित्यिक मानदंड स्थापित करना, भारतीय भाषाओं में साहित्यिक गतिविधियों को समन्वित करना एवं उनका पोषण करना तथा उनके माध्‍यम से देश की सांस्कृतिक एकता का उन्नयन करना होगा |”  साहित्य अकादेमी साहित्यिक-संवाद, प्रकाशन और उसका देश भर में प्रसार करने वाली केन्द्रीय संस्था है तथा सिर्फ़ यही ऐसी संस्था है, जो कि भारत की चौबीस भाषाओं, जिसमें अंग्रेजी भी सम्मिलित है, में साहित्यिक क्रिया-कलापों का पोषण करती है । अकादेमी प्रत्येक वर्ष संविधान द्वारा मान्यता प्रदत्त चौबीस भाषाओं में लिखित साहित्यिक कृतियों के लिए पुरस्कार प्रदान करती है, साथ ही इन्हीं भाषाओं में परस्पर साहित्यिक अनुवाद के लिए भी पुरस्कार प्रदान किए जाते हैं । ये पुरस्कार साल भर चली संवीक्षा, परिचर्चा और चयन के बाद घोषित किए जाते हैं । अकादेमी प्रतिष्ठित लेखकों को महत्तर सदस्य और मानद महत्तर सदस्य चुनकर सम्मानित करती है । अकादेमी उन भाषाओं के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान करने वालों को 'भाषा सम्मान' से विभूषित करती है, जिन्हें औपचारिक रूप से साहित्य अकादेमी की मान्यता प्राप्त नहीं है । यह सम्मान 'क्लासिकल एवं मध्‍यकालीन साहित्य' में किए गए योगदान के लिए भी दिया जाता है । अकादेमी ‘युवा-साहित्य’ और ‘बाल-साहित्य’ के प्रोत्साहन के लिए भी पुरस्कार देती है |
वस्तुतः पुरस्कार वापसी के साथ अपना प्रतिरोध दर्ज करने वाले लेखकों और बुद्धिजीवियों  के साथ न होकर इसके विरोध में कुछ लोगों की प्रतिक्रिया निश्चित ही ऐसे लोगों के 'समकाल' पर सवालिया निशान लगाती है | जिनको यह 'समय' हैरान-परेशान नहीं कर रहा वे निश्चित ही उस 'भावी' के भी जिम्मेदार होंगे जिसके पदचाप वो नहीं सुन पा रहें हैं | रही बात 'अकादेमी' को ख़त्म या बनाने की तो यह देखने की जरूरत है कि पूरे देश की 'संस्थाओं' 'अकादमियों' को सरकार क्या बनाना चाहती है ? 'ललित कला अकादेमी' 'संगीत नाटक अकादमी' 'भारतीय इतिहास अनुसन्धान परिषद्' 'फिल्म इंस्टीट्यूट, पुणे' और अब 'तीनमूर्ति संग्रहालय और पुस्तकालय' | क्या ये ख़त्म हो रहे हैं या इन्हें नए सिरे से बनाया जा रहा है? बुल्गारिया के कम्युनिस्ट नेता जॉर्ज़ दिमित्रोव ने के इस कथन को समझना चाहिए – “फासीवादी समूचे जातीय इतिहास को टटोल रहे हैं, जिससे वे साबित कर सकें कि अतीत में जो कुछ भी वीरतापूर्ण और गौरवपूर्ण था उसके असली वारिस वे ही हैं | उनकी स्वनिर्मित परम्परा और संस्कृति की व्याख्या में आम जनता की जातीय भावना को आहात करने वाला जो कुछ भी घृणित या पतित है उस पर प्रहार करते हुए उसका उपयोग फासीवाद के शत्रुओं के खिलाफ करते हैं”- (सेलेक्टेड आर्टिकल एंड स्पीचेज – जॉर्ज़ दिमित्रोव) | इसलिए, इस 'व्यापक असहमति' को असहिष्णुता और कट्टरवाद के विरोध के रूप में देखना होगा जो इस देश में किसी भी तरह के संभावित 'फासीवाद' के खतरे को रोकने में जरूरी पाथेय बन सके | आज हम सभी अपने जीवन में एक न एक प्रकार से एक ऐसी संदिग्धता और भय का सामन कर रहे हैं जिसमें आशंका है कि इस देश की वास्तविक छवि नष्ट न हो जाय | इस देश के संवैधानिक मुखिया महामहिम राष्ट्रपति इधर लगातार इस आशंका को दर्ज कर चुके हैं |
अंटोनियो ग्राम्शी जिसे सिविल सोसायटीऔर पॉलिटिकल सोसायटीके अंतर्विरोध कहते हैं उसकी शिनाख्त करने में साहित्य हमारी सहायता करता है | साहित्य के द्वारा समाज और संस्कृति की जहाँ सामान्य वास्तविकताएं हमें उपरी तौर पर दिखती हैं वहीं साहित्य की आंतरिक परतों में वह अंतर्विरोध भी गहरे पैठा रहता है जो किसी भी नागरिक-समाज और सत्ता-तंत्र के रिश्तों की पहचान कराता है | यह सच है कि, एक बड़े ऐतिहासिक बदलाव के दौर में सिविल सोसायटीऔर पॉलिटिकल सोसायटीमें अंतर्विरोध पैदा होते हैं,  परंतु यदि सिविल सोसायटीके वैज्ञानिक और लोकतान्त्रिक निर्माण और विकास में पॉलिटिकल सोसायटीकी धीरे-धीरे जवाबदेही खत्म होती जाय तो गहरी रिक्तता हमेशा के लिए जड़ जमा लेती है | इस देश में जो वर्तमान सत्ता है उसने पूरे आवेग और तैयारी के साथ इस जड़ जमा चुकी रिक्तता पर कब्ज़ा कर लिया वरना वोट का प्रतिशत तो उसके पास कुल मतों का मात्र 29% ही है | और अब राजनितिक सत्ता-तंत्र पर काबिज यह शासन-व्यवस्था मनोनुकूल विधि-निषेधों को राष्ट्र-राज्य के तथाकथित हित और सुधार और बदलाव और विकास के नाम पर उसे जिस एजेंडे को लागू करना है वह लागू करने का हर उद्यम कर रही है | अगर एजाज अहमद से शब्द लें तो इन सबके लिए कोई टेरेन ऑफ इन्क्वायरी’ ‘सिविल सोसायटीके पास नहीं है | भारत जैसे गणतंत्र में यह अंतर्विरोध और गहरे तक धंसा होता है | खासकर, जब धर्म कहीं न कहीं इस तरह के नए राष्ट्र-राज्य की पूरी संरचना में सन्निहित रहता है | इस अंतर्विरोध को एक लेखक बहुत शिद्दत से देखता परखता है उसकी जो  रचनात्मक चिंता है वह महज अपनी कलम की चिंता नहीं है वरन उसमें उस ‘सिविल सोसायटी की चिंता है जिसे सरकारें समय-समय पर कभी धर्म के नाम पर तो कभी राष्ट्रीय स्वाभिमान के नाम पर और कभी विकास की इजारेदारी के छद्म में छलती रहती हैं | लेखक, कलाकार, बुद्धिजीवी अपने प्रतिरोधी हस्तक्षेप से समय-समय पर असंभव खतरों की संभावना से इस ‘सिविल सोसायटी को एलार्मकरते रहते हैं | सरकारी तंत्र और व्यवस्था के लिए किसी भी सिविल सोसायटी में बुर्जुआजी की यह सबसे जरूरी भूमिका होती है | सरकारें उनके इस कार्य-व्यवहार से घबराती हैं | और इस घबराहट में ही सरकार के नुमायिंदे उल-जूलूल बयान देते हैं, मजाक उड़ाते हैं | इसलिए यह सवाल कि, ‘साहित्यकार को अपनी कलम पर ध्यान देना चाहिए उसे राजनीति नहीं करनी चाहिए |’ तो, ऐसी नेक सलाह देने वाले को न तो ‘साहित्य’ का ही कुछ पता है न ‘राजनीति’ का | खैर, साहित्य के बारे में पता न होने की बात तो समझ में आती है, वह इसलिए कि हमारे देश के अधिकांश राजनेताओं को साहित्य और साहित्यकारों से क्या लेना देना | पर, हमारे राजनेता जिस ‘राजनीति’ के आधार-कार्ड धारक नागरिक हैं उसके बारे में ही उनकी राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सोच क्या है ? क्या केवल चुनाव हारना-हराना ही राजनीति है ? क्या ये ‘राष्ट्रवादी’ राजनेता एक राष्ट्र को महज चुनावी राजनीति का मैदान भर मानते हैं ? अगर नहीं तो फिर, साहित्य, राजनीति या अन्य दूसरे कर्म अपनी-अपनी जमीन पर बेहद नैतिक और उत्तरदायी कर्म हैं | इसलिए साहित्यकार अगर राजनीति भी करेगा तो ‘सिविल सोसायटी की अपनी उत्तरदायी जवाबदेही के लिए करेगा और यह राजनीति तो उसे करनी ही चाहिए | एक कलमकार की राजनीति केवल अपने देश तक ही नहीं, बल्कि मनुष्य के मान और मानाधिकारों के समर्थन में दुनिया के हर कोने तक पसरी होती है | उसकी चिंता, उसकी बेचैनी और उसकी भूमंडलीय नागरिकता के दायरे में राजनीति क्या हर वह चीज आती है जिसमें आदमी को आदमी से बाँटने और अलग करने की कोशिशें होती रही हैं | दुनिया में जहाँ कहीं भी इंसान को किसी भी तरह के भय और हिंसा से प्रताड़ित किया जाता है, कलमकार ऐसे किसी भी जुल्म और जुल्म को प्रश्रय देने वाली या अपनी चुप्पियों से हिंसा और बर्बरता का समर्थन करने वाली, कट्टरता के मंसूबों को निर्भय और निरापद साहस देने वाली सरकारों के खिलाफ प्रतिरोध की संस्कृति रचने और उस संस्कृति के पक्ष में, उसकी रक्षा के लिए वह सबकुछ करता है जिसे आपकी भाषा में ‘राजनीति’ कहा जाता है | परंतु, एक चीज पर विश्वास कीजिये, निश्चित ही यह न तो ‘मैनुफैक्चर्ड’ होता है न ही ‘फैब्रिकेटेड’ | ‘मैनुफैक्चर्ड’ और ‘फैब्रिकेटेड’ तो नफरत, घृणा, दंगे और आतंक होते हैं, दुनिया भर में जो लोग साहित्य की मैनुफैक्चरिंग में लगे हैं वे किसी भी तरह की तानाशाही और उसके आतंक के खिलाफ बहुत पहले से अव्वाज़ बुलंद करते रहे हैं और जब-जब उन्हें लगेगा कि उनकी अभिव्यक्ति खतरे में है तब-तब वे इसी तरह से आवाज बुलंद करते रहेंगे |  रही बात, साहित्यकारों, कलाकारों, संस्कृतिकर्मियों की ‘विचारधारा’ का तो आपको अपने से विरोधी विचारधारा के लोगों से इतना भय क्यों ? ‘विचारधारा’ थोपी नहीं जाती बल्कि विवेकवान होने की प्रक्रिया में व्यक्ति का लोकतान्त्रिक चयन होती है | दुनिया के हर लोकतंत्र में सबको इस चयन का अधिकार है | पर, दुर्भाग्य से जिन समाजों में इसे थोपने का प्रयास किया गया है वहाँ तानाशाही बढ़ी है, फासीवाद का जन्म हुआ है | क्या भारत की वर्तमान सत्ता अपने आचरण से इसी ओर नहीं बढ़ रही है ? अगर वह अपने से पूर्व की शासन व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर के ‘राष्ट्रवाद’ के नाम पर धार्मिक और सांस्कृतिक बँटवारा करना चाहती है तो उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि, इस देश में यह संभव नहीं क्योंकि, आज हम जिस दुनिया में रह रहें हैं वह दुनिया अपने विचार, अपनी आस्था, अपनी राष्ट्रीयता, अपने अधिकार, अपनी स्वतंत्रता, अपनी निजता और अपनी अस्मिता को बहुत गहरे तक जीने वालों की दुनिया है | वह क्या लिखे, वह क्या पढ़े, वह क्या खाए, वह क्या पहने, वह कौन सा गीत-संगीत सुनें, किससे प्रेम करे, किससे घृणा करे,  इसकी स्वतंत्रता है उसे और वह इस स्वतंत्रता को किसी भी कीमत में गँवाना मंजूर नहीं | इस विरादरी के सामने ही माननीय प्रधान मंत्री ने ‘सबका साथ सबका विकास’ का नारा बुलंद किया है | अगर यह केवल ‘रेटारिक’ है तो लोगों को बहुत जल्दी समझ में आ जाएगा, बल्कि आने लगा है | किसी खास मकसद के लिए तैयार किया जाने वाला ‘रेटारिक’ बहुत खतरनाक होता है | ऐसा रेटारिक सार्वजनिक रूप से भीड़ के भावावेश को उभारता है और लोग बालोचित आशावाद में भ्रमित होकर झूठ सुनते हुए अपने को निश्चिंत और सुरक्षित महसूस करते रहते हैं | जिस समाज में हम इस कदर भटक जायँ कि खुद से ही झूठ बोलने लगें और उस झूठ पर विशवास भी करने लगें तो उस सामज को कोई नहीं बचा सकता | पूरी दुनिया में लेखक और बुद्धिजीवी समाज को इससे सचेत और बचाने का उद्यम करता रहा है | यही उसकी राजनीति है और यही उसकी विचारधारा | यह कैसे संभव है कि, मुँह से मनुष्यता के विकास और उसके आदर्शों को बखाना जाय और सोच, विचार व आचरण में कट्टर और दहशतगर्द हैं, धार्मिक-सामाजिक-सांस्कृतिक  वातावरण में जहर घोलने के लिए उद्धत हैं , उनके समर्थन में चुप रहा जाय | ऐसे मूक समर्थन को क्या मान जाय ?
दुनिया भर में संकीर्णता और कट्टरता का जो भी इतिहास रहा हो पर सौभाग्य से हमेशा उसका प्रतिरोध मानवीय गरिमा और मानाधिकार के पक्ष में लिखने, रचने और बोलने वाले साहित्यकारों, कलाकारों और संस्कृतकर्मियों ने ही किया है | जाति, धर्म, देश इन सबसे परे जाकर किया है | एक लेखक या एक कलाका र ‘जड़ सांस्कृतिक परजीवी’ नहीं होता वरन वह ‘संस्कृतियों’ के निरंतर सृजन, निर्माण और विकास का कर्ता भी होता है और संरक्षक भी | इसलिए, इतने बड़े पैमाने पर लेखकों, बुद्धिजीवियों, समाज-वैज्ञानिकों, इतिहासकारों और संस्कृतिकर्मियों के प्रतिरोध को किसी भी तरह से ‘यह हुआ तो वह वह क्यों नहीं किया गया’ या ‘इस समय ही क्यों उस समय क्यों नहीं किया गया’ के गैरवाजिब तर्कों से ख़ारिज नहीं किया जा सकता | एक लेखक मानवीय गरिमा, धार्मिक-सहिष्णुता, वैचारिक-स्वातन्त्र्य, अभिव्यक्ति की आजादी और तार्किक व वैज्ञानिक समाज के निर्माण और विकास के पक्ष में अपने रुख को हमेशा से ही स्पष्ट करता रहा है, अपनी रचना और अपने व्यवहार दोनों में |
पक्षधर के इस अंक में वरिष्ठ कवि-आलोचक कुँवर नारायण की ग्यारह कविताएँ, इन ग्यारह कविताओं को केंद्र में रखकर कुँवर नारायण की कविता पर पंकज बोस का लेख, अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में खुद कुँवर नारायण का लेख, कुँवर नारायण की काव्य-कला पर स्व. सत्यप्रकाश मिश्र का लेख इस अंक की उपलब्धि हैं | इस पूरी सामग्री के चयन, नियोजन और प्रस्तुति में पंकज बोस के सहयोग के लिए हम उनके आभारी हैं |
पक्षधर, प्रो. एम. कुलबुर्गी, पुष्पपाल सिंह, डॉ. ए. पी.जे. अब्दुल कलाम, गोपाल राय और वीरेन डंगवाल को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है | पक्षधर के आगामी दो अंकों के लिए हम ‘उपन्यास : कला और सिद्धांत’ पर विशेषांक की योजना बना रहे हैं | इसलिए, आगामी अंकों के लिए हम अपनी योजना के अनुरूप रचनाएं आमंत्रित करेंगे |


10 सितंबर 2015

सवालों के आईने में साहित्य का प्रतिबिम्ब
                 (हमारे समय में हिंदी भाषा और साहित्य का पक्ष)

                                                                                            विनोद तिवारी 

 देश और देश के बाहर हिंदी का पितर-पख (पितृ-पक्ष) आने वाला है | देश के सभी सरकारी कार्यालयों में हिंदी पखवाड़ा के नाम पर हिंदी का जयकारा 14 सितम्बर तक गूंजता रहेगा ‘बिकाज ऑफ़ हिंदी इज अ ऑफिसियल लैंग्ववेज़’ | ‘बोलो हिंदी मातु की जय !’ जय जय जय जय हे ! फिर साल भर हिंदी की ‘हिंदी’ करते रहिए | कोई फर्क नहीं पड़ता | अंग्रेजी का सिक्का बदस्तूर चलता रहेगा | ऐसा क्यों हुआ इसकी तफसील में यहाँ जाने की जरूरत नहीं | शायद सब जानते हैं कि ऐसा क्यों हुआ | हिंदीतर प्रान्तों में हिंदी के विरोध का रोना तो खूब रोया गया पर अपने ही घर में वह किस कदर जर्जर, कमजोर, घृणित और उपेक्षित होती चली गयी इसको लेकर न कोई ग्लानि न कोई पश्चाताप | आजादी से पूर्व हिंदी भाषा में बोलने, लिखने-पढने और हिंदी की तरह का जीवन जीने वाले लोगों की तादाद आज से अधिक न थी | परंतु, दुर्भाग्य से वह उस समय संविधान की ‘ऑफिसियल लैंग्ववेज़’ नहीं थी वरन लोगों का उस भाषा से, उसके साहित्य से एक अर्थपूर्ण भावात्मक जातीय रिश्ता था | क्या कारण रहा कि वह अर्थपूर्ण भावात्मक लगाव, वह जातीय रिश्ता धीरे-धीरे बदरंग होते-होते इस कदर धूमिल हो गया कि हिंदी की बात करना जैसे अब पुरानी और बेकार की बात करना हो गया है | दरअसल, एक गड़बड़ तो तभी हुआ जब राष्ट्रीय एकता के नाम पर ‘एक राष्ट्र एक भाषा’ की धारणा पर जोर दिया गया और इसे राष्ट्रीय अस्मिता के साथ जोड़ कर प्रस्तुत किया गया | दूसरी गड़बड़ तब हुयी जब संविधान में उन्नत और सक्षम हो जाने की अवस्था में हिंदी और और उसकी लिपि को ‘राजभाषा’ और लिपि का दर्ज़ा दिए जाने की बात कही गयी | इसके कारण राजनीतिक पैंतरेबाजियों, प्रयत्नों, दबावों और विरोध के चलते हिंदी का जितना नुकसान हुआ उतना शायद अपने ही देश में एनी किसी दूसरी भाषा का नहीं | क्या अंग्रेजी को बनाये रखने की यह सोची-समझी रणनीति थी ? ‘राष्ट्रभाषा’ या ‘राजभाषा’ जैसा विभाजन ही गलत था | किसी अन्य राष्ट्र  में इस तरह का विभाजन आपको नहीं मिलेगा | क्या ‘राजभाषा’ का अर्थ केवल ‘ऑफिसियल लैंग्ववेज़’ है तो फिर ‘राष्ट्रभाषा’ का क्या अर्थ जिस भाषा में मनुष्य पहली बार तुतलाता है, हकलाता है, खुलता है और अभिव्यक्त होता है, दुनिया के प्रति उन्मुख होता है और उससे जुड़ता है वही उसकी मातृभाषा होती है | इसलिए दुनिया की हर भाषा आत्यंतिक रूप से मातृभाषा होती है किन्तु हर भाषा की दुनिया अपने में अलग होती है | यह समर्थ अलगाव ही उस भाषा की पहचान होती है | हिंदी की दुनिया अंग्रेजी की दुनिया कभी नहीं हो सकती पर दुर्भाग्य से बाज़ार ने अन्य कई प्रकार के  भ्रमों की तरह  एक तरह का यह भी भ्रम फैला रखा है कि, हिंदी में क्या रखा है ? वह तो ऐसे गँवार, भदेस, भूखे, गरीब बहुसंख्य लोगों की भाषा है जिनकी कोई औकात नहीं | वह कुछ-कुछ कविता-कहानी की भाषा है, ज्ञान-विज्ञान और विचारों की भाषा वह नहीं है | हिंदी में ‘वैचारिक-स्वराज’ नहीं के बराबर है या है ही नहीं | यह सुना जा रहा है और बताया भी जा रहा है कि यह देश सभी क्षेत्रों में उन्नत, सक्षम और विकसित होता जा रहा है सिवाय ‘हिंदी’ के | नहीं, नहीं ऐसी बात नहीं है हिंदी ने भी खूब उन्नति की है, विकास किया है और वह हर संभव सक्षम हुयी है | न, न मैं नहीं मानता | अगर, यह सच होता तो हिंदी को उसकी जगह मिल जानी चाहिए जिसके लिए संविधान में वह अंग्रेजी की टांग पकड़ कर लटकी हुयी है | संविधान में यही तो शर्त राखी गयी कि जिस दिन वह विकसित और सक्षम हो जायेगी इस राष्ट्र की ‘राज्य भाषा’ हो जायेगी | ‘उसके फरेबे हुस्न से छलके हैं शोबए-नूर’ | मेरी नजर में मूल समस्या यहीं है – संविधान में | यह समस्या ठीक वही समस्या है जो इस वाक्य से परिलक्षित होती है – ‘इंडिया दैट इज भारत’ | इस वाक्य से भी – ‘हिंदी दैट इज ऑफिसियल लैंग्ववेज़’ | संविधान में हिंदी का जिक्र किया जाता नहीं किया जाता बहुत फर्क नहीं पड़ता पर हिंदी की जगह अंग्रेजी चलती रहेगी यह उल्लेख करना ही छलावा था | एक तरह का फरेब था| हमारे समय के तमाम बड़े झूठों में से एक बड़ा झूठ है किसी भी भाषा का सालाना जलसा करना और उस दिन यह शपथ लेना कि हम अपनी भाषा में कार्य करेंगे | हिंदी के लिए कुच्छ और किया जाय या न किया जाय यह ‘पितर-पख’ मनाना बंद होना चाहिए | 14 सितम्बर का यह धंधा बंद होना चाहिए | 
क्या कारण है कि, इतना सक्षम और विकसित होने के, प्रचुर मात्रा में साहित्य सृजन और चिंतन के और राष्ट्रीय स्तर के हिंदी सम्मेलनों से लेकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर के विश्व-सम्मेलनों के बावजूद हिंदी के प्रति लोगों का वह अर्थपूर्ण भावात्मक लगाव नहीं उत्पन्न हो पा रहा | क्या हिंदी में जीवन जीने का, रहन-सहन का ढंग और ढब घट रहा है | यदि किसी भाषा में जीवन-पद्धति और कार्य-कुशलता ही खत्म होती जायेगी तो वह भाषा और उसमें सृजित साहित्य लोगों की रुचि और स्वाभिमान का कारण क्योंकर हो | इसकी पड़ताल होनी चाहिए | यह सच है कि किसी भी भाषा और उसमें बनने –विकसित होने वाले जीवन और मिजाज को बदलने से नहीं रोका जा सकता, उसकी दारोगागिरी नहीं की जा सकती | परन्तु, उसमें बनने-बिगड़ने वाले समाज और साहित्य की स्थिति और विकास पर बात होनी चाहिए | एक युग बीत गया | अब नया युग है | इस नए मिजाज में, नयी चाल-ढाल में हिंदी भाषा और साहित्य पर बात करना दयनीय होने तक दर्दनाक है | पर इस दैन्यता और दर्दनाक स्थिति में अपने को खंगालना में भी एक रोमान तो है ही |
जातीय स्मृति के तर्क से भी और सामाजिक-ऐतिहासिक-राजनीतिक परविर्तनों और  विकास की दृष्टि से भी, किसी भी समय को जानने समझने के लिए उस समय की भाषा और साहित्य के पक्ष को एक जरूरी प्रमाण के रूप में देखा जाना चाहिए | आज साहित्य पर, साहित्य के पक्ष पर और साहित्य मात्र पर ही क्यों समूची सांस्कृतिक निर्माण के प्रक्रिया पर बातचीत हमारे समय की ठोस वास्तविकताओं पर आधारित होनी चाहिए | हमारे समय में साहित्य का पक्ष क्या है ? इस सवाल पर बातचीत समकालीन महत्व रखता है | इसे हमें साहित्य के ‘बैलेंस शीट’ की तरह देखना चाहिए | आज जो सबसे बड़ा सवाल है वह यह है कि, हम साहित्य का पक्ष किसके सापेक्ष, किसके बरक्स तय कर रहे हैं | किसी पूर्व-निर्धारित निरपेक्ष सार्वभौम सत्य के सापेक्ष अथवा अपने समय की मौजूद स्थितियों-परिस्थितयों के सापेक्ष कहा जाता है कि, ‘साहित्य का अपना सत्य होता है |’ असंख्य बार कहे हुए इस वाक्य की तमाम अर्थ-ध्वनियों में से एक में यह अर्थ अंतर्निहित होता है कि साहित्य किसी राजनीतिक-सत्य या विचारधारात्मक-सत्य का उपनिवेश नहीं होता | पर, आज हम सब यहाँ साहित्य की भूमिका या उसके पक्ष पर जिस ‘हमारे समय’ समय के परिप्रेक्ष्य से बात करना चाह रहे हैं उस पर क्या इतने अमूर्त और सार्वभौम सत्य वाली टेक से बात संभव है | यह तो शुतुरमुर्गी सोच होगी | आज साहित्य पर, साहित्य के पक्ष पर और साहित्य मात्र पर ही क्यों समूची सांस्कृतिक-निर्माण की प्रक्रिया पर बातचीत हमारे समय की ठोस वास्तविकताओं और जरूरतों के आधार पर होनी चाहिए |
मैं जब यह बात कह रहा हूँ तो इसका अर्थ यह कदापि न लिया जाय की मैं समय को निपट वर्तमान के अर्थ में ही ग्रहण कर रहा हूँ | वास्तव में तो साहित्य के लिए समय वही नहीं है जो हमारा निपट वर्तमान है वरन् वह समय भी है जो हमें भविष्य में अपेक्षित है | इसलिए भी हमें आज इस बातचीत को साहित्य के ‘बैलेंस शीट’ की तरह देखना चाहिए | प्रसिद्द इतिहासकार रजनी पाम दत्त का उल्लेख करना चाहूँगा, वे कहते हैं कि, “जब समाज दोराहे पर खड़ा होता है, जहाँ उसे विकल्प की तलाश होती है, उस समय यदि जनतांत्रिक शक्तियाँ इतनी बलवती होती हैं कि विकल्प दे सकें तो विकल्प मिल जाता है, अगर ऐसा नहीं होता या भटकाव की स्थिति बनी रहती है तो फासीवाद का उदय होता है |”[1] साहित्य हमेशा से ही ऐसे किसी भी ‘अधिनायकवाद’ अथवा ‘फासीवाद’ के खिलाफ एक समानांतर लोकतान्त्रिक विकल्प रचने का प्रयास करता रहा है | क्या वह आज भी अपनी इस भूमिका से, अपने पक्ष से वाकिफ है ? जिस समय और समाज को लेकर हम चिंताग्रस्त हैं उसी समय और समाज के अन्दर पहुँचने और पसरने की कार्य-संस्कृति के लिए साहित्य के पास आज मुद्दा क्या है ? रोड मैप क्या  है ? क्या हम आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की तरह से यह पूछ सकते हैं कि, “वास्तव में वह वस्तु क्या है, और वह परिस्थिति क्या है, जिसे हम बदलना चाहते हैं | काल्पनिक प्रेत को घूँसा मारना बुद्धिमानी का काम नहीं है | नगरों और गाँवों में फैला हुआ, सैकड़ों जातियों और सम्प्रदायों में विभक्त, अशिक्षा, दारिद्र्य और रोग से पीड़ित मानव-समाज आपके सामने उपस्थित है | भाषा और साहित्य की समस्या वस्तुतः उन्हीं की समस्या है | क्यों ये इतने दीन- दलित हैं? शताब्दियों की सामजिक, मानसिक और अध्यात्मिक गुलामी के भार से दबे हुए ये मनुष्य ही भाषा के प्रश्न हैं और संस्कृति तथा साहित्य की कसौटी हैं |”[2]
उपर्युक्त पुरानी चुनौतियों के साथ-साथ आज हमारे सामने अनेकों नईं और बहुविध चुनौतियाँ उभरकर आयी हैं | जिस तरह से राजनीतिक उत्पातों से लेकर बाज़ार में उपलब्ध भिन्न-भिन्न उत्पादों (जिसमें साहित्यिक-उत्पाद/उत्पात भी सम्मिलित है) तक में आज एक निर्लज्ज किस्म का बाजारू प्रोपेगैंडा रचकर जिस तरह से रुचियों, जरूरतों, विचारों और चयन की स्वतंत्रताओं को प्रभावित किया जा रहा है, बिगाड़ा जा रहा है उसकी चिंता उसका प्रतिरोध साहित्य के अन्दर कहाँ है ? अगर टेरी ईगल्टन की माने तो क्या इस अरुचि का एक सीधा रिश्ता ‘कमोडीफिकेसन ऑफ लिटरेचर’[3] से नहीं है | नव उदारवादी/पूंजीवादी अर्थ-व्यवस्था में हर चीज एक ‘उत्पाद’ है एक ‘वस्तु’ है इसके अलावा कुछ नहीं | ‘साहित्य’ भी अगर महज इस ‘मुक्त-बाजार’ में एक वस्तु मात्र है, एक उत्पाद भर है तो स्वाभाविक है कि इस बाज़ार में मौजूद हर वह नागरिक ऐसे  ‘उत्पाद’ या ‘वस्तु’ के मूल्य आँकने का अधिकार स्वतः पा जाता है |
साहित्य के लिए सदा से ही इस सरोकार की बात की जाती रही है कि उसे ‘भीड़’ को ‘समाज’ में बदलने का प्रयास करना है | यदि आप वास्तविक सामजिक संघर्षों से जुड़े बगैर साहित्य और संस्कृति के प्रश्नों को हल करना चाहते हैं तो वह उतना ही आसान होगा जैसे केवल ‘क्रान्ति’ ‘कामरेड’ और ‘लाल सलाम’ जैसे शब्दों को ओढ़कर उग्र ‘वामपंथी’ बनना और झंडे गाड़कर शिविरों और शाखाओं में बैठकर उग्र सोच-विचार करते हुए फासीवादी एजेंडे को मनवाने के लिए अति ‘दक्षिणपंथी’ होना | ईश्वर, धर्म, पंथ, विचार ये सब मनुष्य की ईजाद हैं | मनुष्य ने अपनी सामाजिकता और सामुदायिकता के लिए इन सबको बनाया | पर, आज ये सब मनुष्य के ऊपर उसकी सीमाओं से पार उसी को डराने और शोषित करने के माध्यम बन गए हैं | “मेरे ख्याल में दुनिया में ऐसे कोई भी विचार नहीं हैं जिनका अस्तित्व मनुष्य की सीमाओं से बाहर हो | मैं यह मानता हूँ कि केवल मनुष्य ही सब वस्तुओं और सब विचारों का रचयिता है | चमत्कारों को पैदा करने वाला और सभी प्राकृतिक शक्तियों का भावी स्वामी भी वही है | कलाओं की दुनिया में जो भी कुछ सबसे सुन्दर है, वह मनुष्य के श्रम द्वारा, उसके चतुर हाथों द्वारा निर्मित हुआ है | श्रम की ही प्रक्रिया में हमारे सभी विचार और भावनाएँ  प्रस्फुटित हुई  हैं और यह बात कला के इतिहास, विज्ञान और प्रौद्योगिकी को देखकर और अधिक पुष्ट होती है | विचार तथ्य का अनुगमन करता है | मैं मानव के प्रति श्रद्धा से नत हूँ क्योंकि इस संसार में जो कुछ भी है वह मनुष्य के विवेक, उसकी कल्पना और विचार-शक्ति का ही परिणाम है | उसने उसी तरह ईश्वर का अविष्कार किया है जैसे फोटोग्राफी का | अंतर केवल इतना है कि कैमरा वही दिखता है जो कुछ वस्तुतः उपस्थित है, जबकि ईश्वर मनुष्य की अपने बारे में गढ़ी गई आदर्श कल्पना की तस्वीर है जो बनने की उसकी इच्छा है यानी सर्वांग, सर्व - शक्तिमान और पूर्णतः न्यायप्रिय हो सकने की कामना | ... यदि पवित्रता के विषय में कुछ कहने की जरूरत है तो मैं कहूँगा कि मेरे लिए पवित्रता का एक ही मतलब है, और वह है मनुष्य का स्वयं के प्रति असंतोष, जो वह है उससे बेहतर बनने की उसकी तड़प, जीवन में विकसित हो रही उन वाहियात चीजों के प्रति उसकी घृणा जिसे उसने खुद ही पैदा किया है | अपने से रचे उसके संसार के सभी लोगों में फैली इर्ष्या, लोभ,अपराध, रोग, युद्ध और शत्रुता के समाप्त कर देने की उसकी इच्छा को भी मैं पवित्र मानता हूँ |”[4]          
मुझे याद आ रहा है कहीं मैं पढ़ रहा था पिछली शताब्दी के नवें या आखिरी दशक में ब्रिटिश संसद के अपर-हाउस में ‘कविता’ की स्थिति और भविष्य को लेकर बहस हुई थी | कैसी कवितायें लिखी जा रही हैं इस पर चिंता व्यक्त की गयी थी | सदन में यह प्रस्तावित किया गया था कि अच्छी कविताओं की जरूरत आज और अधिक है | हमारे देश की संसद के पास ऐसी किसी बहस या चिंता का कोई उदहारण हमारे पास है क्या ? इस देश में क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर को मिलकर बहुत सारे राजनीतिक दल हैं | किसी भी दल में कोई साहित्यिक नीति है क्या ? जो वामपंथी दल हैं उनकी भी साहित्य-विषयक कोई स्पष्ट नीति नहीं है कमोवेश उनके लेखक संगठनों के निष्क्रिय और निष्प्रभावी प्रयासों के उदाहरण के अतिरिक्त |
कृष्णा सोबती ने एक बातचीत में यह कहा है कि उनमें हिंदी की रुचि कैसे और कहाँ पैदा हुई | वे अपने स्कूल के दिनों में में शिमला के माल रोड से जा रही थीं तो उन्हें नागरी में लिखा हुआ इकलौता जो साईन बोर्ड दिखा वह ‘नागरी प्राचारिणी सभा’ का बोर्ड था | उस बोर्ड ने और उस संस्था ने उनके मन को आकर्षित किया | पर आज साहित्य की ही नहीं सभी तरह की सांस्कृतिक संस्थाओं का जो क्षरण हुआ है, पतन हुआ है उसका हमारे समय पर, हमारी सोच पर, हमारी सृजनशीलता पर गहरा प्रभाव पड़ा है | साहित्यिकों, सामाजिकों और राजनीतिकों में इस बात को लेकर कोई चिंता नहीं | कदाचित, एक-आध स्वर इसको लेकर चिंतित होते दिखते हैं | जी.पी. देशपांडे का यह कथन इस सम्बन्ध में उल्लेखनीय है – “हमें यह देखना चाहिए कि समाज अपनी संस्थाओं का निर्माण, संचालन और नियंत्रण कैसे करता है | संस्थाएँ मनुष्य में में अपनी सामजिक अस्मिता का बोध पैदा करती हैं, जिसमें एक इतिहास बोध भी शामिल रहता है, एक प्रकार का कर्तव्य-बोध भी शामिल रहता है और एक प्रकार का सौन्दर्यबोध भी शामिल रहता है | इसी से लोग अपने हर काम को सृजनशील ढंग से करने के लिए प्रेरित होते हैं | चाहे व्यापार करना हो या अपने स्वास्थ्य की देखभाल करनी हो या अपने घर अथवा परिवेश को सुन्दर बनाना हो या साहित्यिक लेखन व कलात्मक सृजन करना हो |”[5]
इन स्थितियों-परिस्थितयों में साहित्य का पक्ष क्या होना चाहिए इसका उत्तर पा लेने से पहले यह पूछा जाना चाहिए कि :

1.    जिस समय और समाज को लेकर हम चिंताग्रस्त हैं उसी समय और समाज के अन्दर पहुँचने और पसरने की कार्य-संस्कृति के लिए साहित्य के पास आज मुद्दा क्या है ? रोड मैप क्या  है ?
2.    राजनीति जिन सवालों पर चुप है साहित्य अपने सामाजिक-सांस्कृतिक दायित्व के साथ उन सवालों को, उन बिन्दुओं को उठा रहा है ?
3.    सूचना की ‘महाक्रांति’ वाले इस समय में एक शाश्वत समयहीनता में गुजर-बसर कर रहे जी रहे लोगों को उनके समय से जोड़ने का कोई कार्य साहित्य कर पा रहा है ?
4.    कमोडिटी में बदलते चले जाने की जो प्रवृत्ति इधर बहुत तेज़ी से साहित्य में पैदा हो गयी है, बाज़ारवाद के इन ‘जर्म्स’ से, इन किटाणुओं से हमारे समय का साहित्य बचा रह सकेगा ? ‘पाठक’ नमक संस्था का जिस तेज़ी से क्षरण हो रहा है क्या उसके लिए ज़िम्मेदार केवल बाज़ार है या रचनाकार-साहित्यकार भी ?
5.    साहित्य में ‘प्रोपेगैंडा’ पहले भी रहा है और आज भी है | परन्तु, इधर दिखने और कहने में अति-लोकतांत्रिक पर वास्तविकता में चरम व्यक्तिवाद का मुखौटा ओढ़े रचनाकारों और तथाकथित साहित्यिकों ने जिस तरह से साहित्य को अरुचिकर और अविश्वसनीय बनाया है वह चिंता जनक है | सोशल मीडिया एवं अन्य सेटेलाईट माध्यमों के चलते साहित्य में एक ‘आतंरिक उपनिवेशवाद’ (Internal Colonialism) जैसी मनोवृत्ति और संरचना का विकास होता दिख रहा है | साहित्य में एक बड़े शहरी मध्यवर्ग के संस्कारों और बौद्धिक गतिविधियों के बीच जो दरार है क्या साहित्य इसे प्रश्नांकित कर पा रहा है ?
6.    20-30 साल के आयु-वर्ग वालों की एक पूरी नयी पीढ़ी उभर कर आयी है | हमारे प्रधान मंत्री जिन्हें ‘माउस चार्मर’ पीढ़ी कहते हैं | यह पीढ़ी बहुत ‘स्मार्ट’ पीढ़ी है और इनके लिए ‘स्मार्टनेस’ का एक ही अर्थ है – ऐसी स्किल जो किसी भी तरह से अपना काम सिद्ध कर सके – और उस सिद्धि को, फल को मीडियाकरी के सहारे तार्किकता का जामा पहनाकर वैधता देने की कोशिश करे | यह स्किल, यह तार्किकता, यह वैधता दरअसल  पूँजीवादी मूल्यों का, बाजार का विस्तार है, वैधता है | इस स्किल में वे युवा भी शामिल हैं जिन्हें मक्सिम गोर्की मानते हैं कि ‘वे साहित्य और संस्कृति के नाम पर अहमवादी व्यक्तित्व का मात्र खाल ओढ़े, आत्मा में थकान और मन में व्यग्र करने वाली आशंकाएं लिए कभी समाजवाद से इश्क फरमाते हैं तो कभी पूँजीवाद की खुशामद करते हैं | उनकी निराश एक भयंकर अनास्था का रूप ले लेती है | कल तक जिसकी वह पूजा करते आये थे आज उसी को उन्मादी की तरह नकारने और आग में झोंकने लगते हैं |’ क्या साहित्य इस चालाक ‘स्मार्टनेस’ को चिह्नित कर पा रहा है और यदि कर पा रहा है तो उसका पक्ष क्या है ?
7.    साहित्यिक-सांस्कृतिक संगठनों में अब कितनी जान बची है ? वे किस तरह की भूमिका का निर्वाह कर रहे हैं ? राम विलास शर्मा ने अपने एक साक्षात्कार में कहा है कि, “किसी भी संगठन को लुंजपुंज नहीं होना चाहिए | लुंजपुंज संगठनों से मेले हो सकते हैं , कोई ठोस काम नहीं |”
8.    आज साहित्य की ही नहीं सभी तरह की सांस्कृतिक संस्थाओं का जो क्षरण हुआ है, पतन हुआ है उसका हमारे समय पर, हमारी सोच पर, हमारी सृजनशीलता पर गहरा प्रभाव पड़ा है | साहित्यिकों, सामाजिकों और राजनीतिकों में इस बात को लेकर कोई चिंता है ?
9.    क्या धर्म संसद, विज्ञान कांग्रेस, इतिहास कांग्रेस, समाजविज्ञान कांग्रेस जैसी सालाना संसदों की तर्ज़ पर साहित्य संसद जैसी कोई सालाना बैठक है ? ‘लिटरेरी फेस्टिवल’ की तरह का नहीं |
10.  सेटेलाईट माध्यमों के आक्रमण के आगे समाज का अधिकांश हिस्सा आत्मसमर्पण करता जा रहा है | हम अपने ही देश में सांस्कृतिक रूप से विस्थापित हैं | सांस्कृतिक-राजनीतिक मुँहजोरी का इतना भव्य और आकर्षक किन्तु विकृत रूप इतने अकुंठ भाव से पहले कभी नहीं हुआ | झूठ को इतना बह्व्य और आकर्षक बनाकर पेश करने की इतनी कोशिश पहले कभी नहीं दिखी | धर्म का वितंडा इधर न छंटने वाले कुहासे की तरह पसरता जा रहा है | सनसनी और अफवाहें जहरबाद की तरह अपने असर में फैलती जा रही हैं | इस तरह की प्रवृत्तियों को रोकने के  लिए साहित्यकार लेखन के अलावा और क्या कार्य कर  सकते हैं ?
इन प्रश्नों के अलावा और भी बहुत सारे प्रश्न हो सकते हैं | अगर, आज हमें इस बात की चिंता है कि, हमारे समय में साहित्य का पक्ष क्या होना चाहिए, साहित्य काआने वाला समय कैसा हो तो निश्चित तौर पर इन या इन जैसे और अन्य प्रश्नों के साथ सोचने-विचारने का माहौल बनाना चाहिए और साहित्य के ‘बैलेंस शीट’ को तैयार करना चाहिए |

Ø  विनोद तिवारी : युवा आलोचक | ‘देवीशंकर अवस्थी आलोचना सम्मान’ से सम्मानित | ‘पक्षधर’ पत्रिका के संपादक | सम्प्रति दिल्ली विश्ववविद्यालय में हिंदी का अध्यापन |

Ø  सी-4/604, ऑलिव काउंटी, सेक्टर-5, वसुंधरा, गाज़ियाबाद-201012, मो. 9560236569
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[1] Democracy and Fascism : A Reply to The Labor Manifesto on Democracy vs. Dictatorship -   R. Palm Dutt
[2] मनुष्य ही साहित्य का लक्ष्य है – हजारी प्रसाद द्विवेदी
[3] Literary Theory – Terry Eglton
[4] On Art and Literature – Maxim Gorki
[5] बेहतर दुनिया की तलाश- जी.पी. देशपांडे का साक्षात्कार, (सं.- रमेश उपाध्याय)