2 नवंबर 2012

समकालीन सरोकार - नवंबर, २०१२



यथार्थ के घर में गल्प की रिहाइश
विनोद तिवारी
यथार्थ भी एक गल्प है | तो फिर गल्प क्या है? गल्प का यथार्थ क्या है? गल्प वह है जिसे रचनाकार रचता है | यह या वह रचित संसार ही गल्प का यथार्थ है | केशव ! तो गल्प क्या  एक रचित यथार्थ है | हाँ पार्थ ! रचित यथार्थ ही गल्प है | जब यह कहा जाता है कि, ‘अमुक रचना के सभी पात्र काल्पनिक पात्र (फिक्शनल कैरेक्टर) हैं, वास्तविक जीवन और जगत से उनका कोई वास्ता नहीं है’, तो क्या इसी रचित यथार्थ की ताईद की जाती है?
फिर उक्त लिखे हुए वाक्य और पूरी रचना में घटित कार्य-व्यापार में कोई साम्य क्यों नहीं होता? क्यों दोनों में एक दूसरे को बराबर झुठलाने की कश-म-कश जारी रहती है? कभी लगता है कि नहीं जो दिखाया जा रहा है वह कोरा गप्प है तो कभी लगता है कि नहीं यह तो समाज की वह सच्चाई है जिसे हम जानते हुए भी अनजान बने रहते हैं | कहते हैं न कि, ‘जो दिखता है वह होता नहीं और जो होता है वह दिखता नहीं |’ एक रचनाकार का असल रचनात्मक द्वंद्व यही होता है- दिखने और न होने, होने और न दिखने का रचनात्मक द्वंद्व | एक रचनाकार यथार्थ को गल्प में और गल्प को यथार्थ में, वास्तव को फैंटेसी में और फैंटेसी को वास्तव में, सच को कल्पना में और कल्पना को सच में बुनता-बनाता है | यही उसकी कला है | शायद यही उस रचित कला का यथार्थ भी |
इतालवी दार्शनिक और विचारक बेनदेतो क्रोंचे की धारणा है कि, “जहाँ आख्यान नहीं है वहाँ इतिहास नहीं है |” अगर क्रोंचे की इस धारणा में प्रयुक्त शब्दों को हम बदल दें और कहें कि, “जहाँ गल्प नहीं है वहाँ यथार्थ नहीं है” अथवा जहाँ यथार्थ नहीं है वहाँ गल्प नहीं है” तो कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए | एक बार इतिहास को उलट कर देखने की कोशिश की जाय, इतिहास के वर्तमान रूप को मिटा दिया जाय  और इसकी तलाश की जाय कि राजे –महाराजों के अखानों-बखानों से भरे इतिहास रूपी बखार से भिन्न आदिम मनुष्य कैसे अपनी सामाजिक और सांस्कृतिक स्मृतियों को संजोता रहा है और उन्हें अभिव्यक्त करता रहा है तो हम पाएंगे कि इसकी सबसे मजबूत डोर–छोर उन आख्यानों, वाचिक कथा स्मृतियों, लोकगाथाओं, मिथकों और लोकमानस के रूप/विरूप, सभ्य /असभ्य, पक्व/अपरिपक्व सामूहिक प्रयासों में है जिन्हें हम केवल थाती मानकर कभू–कभू महान  बहु-सांस्कृतिक उदारता के सन्दर्भ में याद कर लेते हैं | इतिहास की अभिजात धारा में इन धारक सांस्कृतिक शक्तियों को केवल लोक-विश्वास (अंधविश्वास) और मिथकीय चेतना के खाते में डालकर इस टिप्पणी के साथ किनारे कर दिया जाता है कि इनकी ऐतिहासिक प्रामाणिकता संदिग्ध है | पर क्या ऐसे में इतिहास की  प्रामाणिकता स्वयंसिद्ध है ? क्या इतिहास गढंत नहीं होता है, उसमें गल्प के तत्व नहीं होते हैं ? अगर सचमुच नहीं तब वह इतिहास मृत पुरातत्व का संग्रहालय मात्र होगा जबकि गप्प, आख्यान और मिथक सामूहिक–मन और चेतना के निरंतर गतिशील सहज स्वभाव | इतिहास लेखन में इन धारक सांस्कृतिक शक्तियों का कोई  पुछंतर ही नहीं जबकि समाज की यही धारक शक्तियां इतिहास में परिवर्तन का पावर हाउस होती हैं | इतिहास बदलने में इन्हीं शक्तियों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है | इन शक्तियों को आप भले ही भूखे – नंगे, गरीब, असभ्य, आदिवासी, नक्सली चाहे जो नाम दे दीजिए पर इतिहास यही बदलेंगे | संस्कृतिवादी पुरोहित पाठ से जुदा निखालिश खांटी पाठ |
दरअसल, रचना एक गढ़न है | एक ऐसी गढ़न जिसे उसका सिरजनहार सिरजता है गढ़ता है | गढ़ंत ही तो किस्सागोई का आदिम तत्व है | जो जितना गढिया वह उतना बढ़िया | के. अयप्पा पणिक्कर ने महाभारत के आख्यानोपाख्यान की संरचना को “नारिकेलोपाख्यान” कहा है | जिस  तरह नारियल के परत-दर-परत को हटाकर उसके रस तक पहुँचते हैं उसी तरह गल्प के यथार्थ को पाने के लिए उन परतों को हटाना पड़ता है जिन्हें रचनाकार गढ़ता है | इसलिए देखा जाय तो एक कथाकार अपनी तात्कालिक सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों में रहते हुए – रचते हुए भी सदैव एक ‘प्राकृतिक- देशकाल’ रचने की कोशिश करता है, जो सार्वभौम होता है | परन्तु, यह ध्यान रहे कि यह प्राकृतिक-देशकाल कोई पारलौकिक संकल्पना नहीं है वरन सभ्यता के विकास में मानव विरोधी यांत्रिकता का एक समानांतर विकल्प है |
एक ऐसा ही समानांतर विकल्प २००६ में साहित्य के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित उपन्यासकार ओरहान पामुक ने अपने शहर इस्तांबुल (तुर्की) में रचा है | इतिहास, पुराण, स्मृति, आख्यान के अंत की घोषणाओं के उत्तर-आधुनिकता वाले समय में यथार्थ की औपन्यासिक पुनर्रचना (फिक्शनल रिक्रिएशन) और उस यथार्थ के गल्प से पुनः एक वास्तविक दुनिया की रचना | एक ऐसी दुनिया की रचना जो एक ‘फिक्शन’ की दुनिया है | ओरहान पामुक का एक उपन्यास है – ‘मासुमियेत म्युज़ेसी’ (द म्युजियम ऑफ इनोसेंस)| यह उपन्यास २००८ में प्रकाशित हुआ और अबतक इसके दसियों संस्करण निकल चुके हैं | यह पामुक का सर्वाधिक बिकने वाला उपन्यास है | ५९२ पृष्ठों का यह उपन्यास ६० से अधिक भाषाओं में अनूदित हो चुका है | पामुक ने इस उपन्यास की दुनिया को, उस दुनिया में रहने वाले लोगों की भावनाओं से जुड़े सामानों और वस्तुओं को जोड़-जोड़ कर बड़ी ही मासूमियत के साथ एक जीते-जागते वास्तविक म्युजियम में नक्श किया है | एक ऐसा म्युजियम जिसमें न तोप हैं न मोर्टार, न खुदाई में मिली वस्तुएं न इतिहास | इसमें कोई ‘पुरातत्व’ है ही नहीं | यह दुनिया में इस तरह का इकलौता म्युजियम है – अपनी तरह का अलहदा यह बड़े ही जतन और इत्मीनान से धीरे – धीरे १२ सालों में एक-एक कर कमाल और फुसून के जीवन से जुडी यादों का एक नायाब संकलन है | फुसून से कमाल के (कह सकते हैं स्वयं नैरेटर के) बेहद प्यार और पागलपन  की एक सनक भरी जिद और कदरदानी |  पामुक जब अपना यह उपन्यास लिख रहे थे तभी से उनके मन में यह सपना पलने लगा कि क्या सच में एक ऐसा म्यूजियम बनाया जा सकता है? धीरे-धीरे उन्हें यह लगने लगा कि हाँ यह किया जा सकता है | पामुक ने अंगरेजी अखबार ‘दि गार्डियन’ को दिए अपने एक इंटरव्यू में यह कहा कि, “ ऐसा नहीं है कि यह म्युजियम उपन्यास लिखे जाने के बाद का सपना है, मैंने उपन्यास और म्युजियम दोनों को साथ-साथ जिया है ( आई कन्सीव नावेल एंड म्युजियम टुगेदर.) | उनकी इच्छा थी कि उपन्यास और म्युजियम दोनों एक साथ सामने आयें पर यह हो न सका, उपन्यास पहले आया म्युजियम २८ अप्रैल २०१२ में | म्युजियम के लिए तीन मंजिला घर तो पामुक ने १९९९ में ही खरीद लिया था | १९ वीं शताब्दी में बना यह घर चुकुरजुमा, इस्तांबुल की अपेक्षाकृत एक शांत सँकरी सड़क के किनारे है | इसके आस-पास रद्दी और पुरानी चीज़ें बेचने वालों की दुकानें हैं जिनमें पुराने पीतल, तांबा, कालीन से लेकर चूने – भट्टी और पुट्टी के अलावा न जाने क्या-क्या है |
दरअसल, उपन्यास की कहानी इस्तांबुल के जिन इलाकों में घूमती है उनमें  चुकुरजुमा, निशानताशी, तकसीम, हारबिये और बेयोलु प्रमुख हैं | ये सभी इलाके इस्तांबुल के ‘हाई प्रोफाईल’ और ‘इलीट’ लोगों के रिहायिशी इलाके हैं | उपन्यास का हीरो कमाल इसी ‘हाई प्रोफाईल’ और ‘इलीट’ इलाके में बीसवीं शताब्दी के छठे दशक में पैदा होता है और पलता-बढता है | खुद ६० वर्षीय ओरहान पामुक निशानताशी में पैदा हुए, उनके जीवन-निर्माण में इन्हीं इलाकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है | हो सकता है कि कमाल और ओरहान एक दूसरे को बहुत करीब से जानते-पहचानते रहे हों, दोनों में यारी रही हो | ऐसे में फुसून से भी पामुक की जान-पहचान होना लाजिमी है | पर यह हो सकता है, यथार्थ में ऐसा था कि नहीं पर गल्प (फिक्शन) की पढ़त से बार-बार ऐसा लगता है | और ऐसा लगता है तो लगने में बुराई क्या है |  सैद्धांतिक तौर पर तो उपन्यास के सिद्धांतकारों ने यह मान ही लिया है कि, “ हर उपन्यास आत्मकथात्मक होता है |” ‘जिन गीतों में शायर अपना गम रोते हैं, वे ही उनके सबसे मीठे नगमें होते हैं |’ ‘मासुमियेत म्युजेसी’ (दि म्युजियम ऑफ इनोसेंस) एक प्रेम-कथा है | कमाल और फुसून की प्रेमकथा | कमाल एक संपन्न घराने का नौजवान और फुसून एक निम्न मध्य-वर्गीय लड़की जो दूर के रिश्ते में कमाल की कजिन लगती है | फुसून से कमाल की पहली मुलकात एक शॉप पर होती है | दोनों एक दूसरे के गले मिलते हैं | तुर्की लोगों में यह रवायत है कि वह अपनी पहचान में एक दूसरे के गले मिलते हैं और कनपटी के नीचे एक दूसरे को चूमकर अपनापे का इज़हार करते हैं | कमाल और फुसून भी इसी तरह मिलते हैं | कमाल जब फुसून को चूमता है तो कमाल को लगता है कि फुसून के कान की बाली उससे फुसफुसाकर कुछ कह रही है | यह पहला एहसास है | वह बाली कमाल के मन में बस जाती है | फिर तो धीरे-धीरे यह फुसफुसाहट कानों से होते हुए दिल तक पहुँचती है | दोनों में प्यार होता है | कमाल फुसून को पागलपन के हद तक चाहने लगता है | पर जैसा कि हर प्रेम-कथा में होता है वह इसमें भी घटित होता है | कमाल की सगाई उसके अपने वर्ग की लड़की सिबेल सो हो जाती है | उधर फुसून की शादी एक संघर्षशील नवोदित फिल्मकार सो हो जाती है | कमाल के चित्त से फुसून उतरती ही नहीं है | वह उसके बिना रहने और जीने की सोच ही नहीं सकता है |  इस प्रेम के ताने-बाने में परत-दर-परत लिपटा हुआ है, सन `’५० से २००० के बीच, पूरी आधी शताब्दी के इस्तांबुल (तुर्की) की उच्च और मध्य-वर्गीय व्यकिगत व सामाजिक जीवन की मौजूद और बनती-बदलती छवियों का यथार्थ : औपन्यासिक यथार्थ – गल्प का यथार्थ | इस उपन्यास में पामुक ने बड़ी ही गहराई से छठे-सातवें दशक में तुर्की के ‘इस्लामिक-टर्न’ को रखने की कोशिश की है | दरअसल, छठे-सातवें दशक में तुर्की समाज अपनी पारम्परिक-आधुनिकता और यूरो-केंद्रित आधुनिकता को लेकर काफी बहस और जद्दो-ज़हद में दीखता है | प्रेम, सेक्स, यौन-शुचिता, जीवन-पद्धति इन सब पर रूढ़िवादियों द्वारा एक सामजिक संस्थान के बतौर वही पुराने नजरिये से देखने सोचने का ढंग है तो दूसरी तरफ इसको व्यक्तिगत-आज़ादी के ‘यूरो-सेंट्रिक’ आधुनिक नजरिये से देखने और जीने वाला नया-खून | इसमें सबसे संदिग्ध बुर्ज्वा-चरित्र  है जो एक साथ दिखावे में तो पाश्चात्य और आधुनिक बने रहने का ढोंग करता  है पर अपनी मनोवृत्ति और रवैये में वही रूढ़िवादी और दकियानूस सोच रखता है | पामुक इस बुर्ज्वाजी की तीखी आलोचना करते हैं | इसका उन्हें खामियाजा भी भुगतना पड़ता है | तुर्की में वह उतने पसंद नहीं किये जाते जितना बाहरी दुनिया में | यहाँ उनके प्रति एक उपेक्षा का भाव है | इसके और भी अन्य कारण हैं |
परन्तु, बात भटक कर कहीं ‘यू-टर्न’ न ले ले इसलिए अभी फिलहाल मूल विषय पर फोकस जरूरी है | कमाल अपने प्यार में इस कदर दीवाना है कि वह फुसून से जुडी हर याद को, हर फ़साने को हर उस चीज़ को सँजो लेना चाहता है उसे संग्रहित कर उससे एक म्यूजियम बनाना चाहता है | वही कामना हम रहें न रहें, प्यार हमारा आबाद रहे | म्युजियम बनाने का सपना कमाल उपन्यास में ही देखता है इसलिए वह हर एक चीज़ को इकट्ठा करता रहता है जो उनकी यादों के हमसफ़र हैं | कभी-कभी वह ऐसी वस्तुओं का संग्रह करता है जिसे नितांत पागलपन कहा जा सकता है | पर यह पागलपन ही तो उसकी
मासूमियत है | वह फुसून के होंठो से लगे सिगरेट के एक-एक टुकड़े को जमा करता है जो गणना में ४२१३ हैं | पामुक ने इन ४२१३ सिगरेट के टुकड़ों को म्यूजियम का हिस्सा बनाया है | म्यूजियम में घुसते ही एक कांच के बड़े से पात्र में सिगरेट के टुकड़ों का पहाड़ दिख जाएगा | तीन मंजिले म्युज़ियम में ८३ शो-केश हैं जो उपन्यास के तिरासी अध्यायों के प्रतिनिधि है | हर शो-केश पर एक कान की बाली टंगी है फुसून के पहली छुअन की पहली निशानी | इन शो-केशों में चाबियाँ, लैम्प्स, घड़ियाँ, पोस्टकार्ड, रेस्टोरेंट के बिल, सिनेमा के टिकट, बसों के टिकट, कप, गिलास, पोर्ट्रेट, राकी की बोतलें (राकी तुर्की की खास शराब है), कपडे, किचेन के सामान, ऑफिसियल कागज़-पत्तर, अखबार की कतरनें, फोटोग्राफ्स, पहचान-पत्र, बैंक पासबुक, आर्टिफिशियल गहने, दरवाज़ों के हैंडल, माचिस, पामुक द्वारा उपन्यास के शुरुआती पृष्ठों की हस्तलिखित पाण्डुलिपि और न जाने क्या-क्या |  तिरासी शो-केशों में भरी ये चीज़ें निर्जीव वस्तु मात्र नहीं हैं इन चीज़ों में कमाल और फुसून के प्यार-मनुहार, दुःख-सुख, हर्ष-विषाद, मूर्त-अमूर्त, कहे-अनकहे गोपन और उन्मुक्त न जाने कितने तरह के भाव और अहसास जिन्दा हैं | बेइंतहा प्यार का ही यह जोर है कि, हर वह लम्हा हर वह याद जो फुसून से जुड़ी है उसे कमाल भुला नहीं पाया और अपनी फुसून को गल्प के बाहर यथार्थ में संजोने लगा | वास्तव में यह म्यूजियम तो जीने का एक बहाना है | जिसमें कमाल और फुसून का प्यार आज भी जिंदा है | शायद, ओरहान पामुक का भी यही सच हो | स्मृति का अमर संसार | किस्से बदलते रहते हैं कहन रह जाता है | यही गल्प और यथार्थ का रचनात्मक संसार है | पामुक का मानना है कि, “चीन, भारत, मेक्सिको, ईरान और तुर्की जैसे देशों के लिए इतिहास और संस्कृति की संपदा का संग्रहालयों में प्रदर्शन अब कोई महत्वपूर्ण मुद्दा नहीं है वरन इन देशों के लिए आज एक महत्वपूर्ण चुनौती उन कहन (टेल्स) को यथाविधि संकलित, संयोजित और प्रदर्शित किये जाने की है जिनमें इन देशों की वैयक्तिक निजता के साथ मानवीय जीवन रचा-बसा है |”
 
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युवा आलोचक | पक्षधर पत्रिका का संपादन-प्रकाशन | दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी का अध्यापन | आजकल अंकारा विश्वविद्यालय, अंकारा (तुर्की) में विसिटिंग प्रोफ़ेसर |
ई-मेल :  tiwarivinod4@gmail.com फोन:+903124418757 मोबा. +9005303639128   

3 सितंबर 2012

ठाट की ठठरी , जनसत्ता ०१ सितम्बर २०१२


दुनिया मेरे आगे, जनसत्ता ०१ सितम्बर २०१२

ठाट की ठठरी
विनोद तिवारी

बचपन में माँ से यह कहानी सुना था कि, एक राजा था जिसको भगवान से वरदान मिला था कि वह जिस किसी भी वस्तु को छू भर देगा वह सोना हो जायेगा | बाद में बड़े होने पर भी इस किस्से के मूल चरित और उसके ओरछोर के बारे में पता नहीं चला कि वह राजा कौन था ? कहाँ रहता था ? जब मैंने पुराण, इतिहास, मिथक, महाकाव्य  और उपन्यास के आपसी रिश्तों पर पी-एच.डी. का काम शुरू किया तो ग्रीक मायिथोलाजी को भी पढ़ने की जरूरत महसूस हुयी तभी मैंने जाना कि, छूकर सोना बनाने वाला राजा ग्रीको-रोमन सम्राट मिडास था | लोक कथाओं में मिडास के बारे में मिलता है कि वह फ्रेगियन साम्राज्य का एक बहुत ही ख्यात राजा था | उसका अस्तित्व ‘ट्रोजन युद्ध’ के पहले, दो हज़ार वर्ष ईसा पूर्व माना जाता है | अरस्तू ने मिडास का ज़िक्र करते हुए उस प्रसिद्ध लोककथा का उल्लेख किया है | होमर के यहाँ मिडास का कोई उल्लेख नहीं मिलता | मिडास के बारे में प्रचलित लोककथा यह है कि, “ एक बार ग्रीक देवता डायोनिसस का मित्र सायिलेनियस फ्रेगियन साम्राज्य घूमने की इच्छा से यात्रा पर निकला | यात्रा में उसने इतना अधिक मदिरा-पान कर लिया कि फ्रेगियन राजधानी गार्डियोन पहुँचते – पहुँचते वह नशे में बेसुध हो चुका था और मिडास के बारे में अनाप-सनाप बोल रहा था | राजा के सैनिकों ने उसे पकड़कर राजदरबार में पेश किया | मिडास ने जब उससे उसका परिचय पूछा और यह जानने के बाद कि वह ग्रीक देवता डायोनिसस का मित्र है उसने तुरंत उसे बंधन मुक्त किया और १० दिन तक उसकी खूब मेहमाननवाजी की | ग्यारहवें दिन उसे लेकर डायोनिसस के पास पहुंचा | इधर अपने मित्र के न मिलने पर हताश – निराश डायोनिसस ने जब मिडास के साथ सायिलेनियस को देखा तो बहुत ही खुश हुआ | उसने मिडास से कहा कि इस खुशी के मौके पर तुम्हारी जो इच्छा हो मांग लो | मिडास ने कहा कि यह बात है तो मुझे वरदान दीजिए कि मैं जिस चीज़ को भी छुऊँ वह सोना हो जाय | डायोनिसस ने कहा कि एक बार फिर से सोच लो पर मिडास के अटल होने पर उसने तथास्तु कह कर मिडास को विदा किया | फिर तो मिडास जैसे खुशी से पागल हो गया हो | वह हर एक चीज़ को छू-छू कर सोना बनाने लगा | इसी बीच में उसकी बेटी उसके सामने आयी वह खुशी से उसे बाहों में भरने के लिए आगे बढ़ा, छूते ही वह सोने में तब्दील हो गयी | वह बहुत रोया | प्यास लगी, पानी छूते ही सोना हो गया, भूख लगी खाना छूते ही सोना | अब उसे समझ में आया कि उसने क्या मांग लिया | उसने डायोनिसस से बहुत प्रार्थना की कि, मुझे इस विपत्ति से मुक्त करो | डायोनिसस ने उसकी हालत पर तरस खा कर उससे कहा कि पैक्तोलस नदी में जाकर तीन बार डुबकी लगाओगे तो इस वरदान से मुक्त हो जाओगे | मिडास ने वैसा ही किया | जिस क्षण उसने डुबकियां लीं उस क्षण पानी के साथ बहने वाली रेत सोने के कणों में तब्दील हो गयी और नदी किनारे सोने की रेत फ़ैल गयी |” 
      पैक्तोलस नदी आज भी तुर्की की एक नदी है जिसे – सोन नदी (आल्तिन नेहेर) के नाम से जाना जाता है | जब तुर्की आया और अंकारा में रहने लगा तो उत्सुकतावश यह जानने की कोशिश करने लगा कि इसका नाम अंकारा कैसे पड़ा | कईयों से तफ्तीश के बाद पता लगा कि इसके तीन नाम हैं– अंकारा, अंगूरा और अंकयीरा | जिसमें सबसे पुराना नाम अंकयीरा है जो मिडास के द्वारा रखा गया था| ग्रीक भाषा में इसका मतलब होता है– लंगर | मिडास के बारे में और पूछने पर यह जानकारी मिली कि, उसके फ्रेगियन साम्राज्य की राजधानी गार्डियोन तुर्की में ही है और अंकारा से लगभग १०० किमी. की दूरी पर ध्वन्साशेष के रूप में आज भी मौजूद है | दरअसल, गार्डियोन नाम मिडास ने अपने पिता गार्डियस के नाम पर रखा था | पूरे योरोप में ‘गार्डियोन नॉट’ मशहूर है | फिर क्या था मैं पहुँच गया उस करामाती सम्राट की राजधानी गार्डियोन | गार्डियोन में मिडास का मकबरा देखा जो हज़ारों वर्षों से चट्टानी मिट्टी जमा होते-होते ढूह बन गया है और बाहर से स्तूप जैसा दिखता है | गार्डियोन में ऐसे सैकड़ों स्तूपनुमा मकबरे मौजूद हैं | मिडास के मकबरे की ऊँचाई ५३ मीटर और चौड़ाई ३०० मीटर है | तुर्की सरकार ने एक तरफ से उन चट्टानों को काटकर सुरंगनुमा रास्ता बनाया है जिससे होकर हम मकबरे तक जा सकते है पर देखना बाहर से ही हो सकता है अंदर जाने का कोई रास्ता नहीं है | खुदाई में मिली फ्रेगियन साम्राज्य की वस्तुओं का संग्रहालय देखा जिसमें फ्रेगियन सभ्यता और संस्कृति की उन्नत निशानियाँ मौजूद हैं | संग्रहालय में चलते-चलते जब अंदर की ओर पहुंचा तो एक मानव कंकाल दिखा जो संग्रहालय का हिस्सा है और जिसके बारे में बताया गया कि यह मिडास का नर-कंकाल है | सारा उत्साह सारी इच्छा सारे कौतूहल एकबारगी उस सुरंग में समाते चले गए जहाँ से मकबरा देखकर हम निकले थे | सन्न गुमसुम उस ठठरी को देखता रहा जिसका कभी इतना ठाट था | ठाट चला गया ठठरी कैमरे में कैद मेरे साथ–साथ घर आ गयी जो महज एक तस्वीर नहीं वरन पूरी तवारीख है एक पूरा मिथ  |  

विनोद तिवारी
विजिटिंग प्रोफेसर
अंकारा युनिवर्सिटी, अंकारा, तुर्की







20 जून 2012

कोन्या में मौलाना रूमी की दरगाह पर

                                         
                                          दुनिया मेरे आगे    
23 जून 2012 जनसत्ता  
कोन्या में मौलाना रूमी की दरगाह पर
विनोद तिवारी
”गज़ल(कविता) में काफिया(तुक) उसी तरह होता है जैसे दाखबारी में चारों ओर लगे बाड़ ” 
 – मौलाना रूमी            
जब से तुर्की आया तब से मसनवी के महान गायक मौलाना रूमी की दरगाह ‘कोन्या’ जाने की ख्वाहिश दिलो दिमाग में बनी हुई थी | पिछले दिनों मन की यह मुराद पूरी हुई |मेरे लिए यह यात्रा बहुत ही प्रेरक और ज्ञानवर्द्धक रही | कोन्या तुर्की का एक सूबा है, यह अनातोलियन सेल्जुक तुर्क शासकों की राजधानी रही है | आज भी यह तुर्की की सांस्कृतिक राजधानी है – धर्म, दर्शन और संस्कृति का अद्भुत रसायन | मौलाना रूमी का जन्म बल्ख में ३० सितम्बर , १२०७ को हुआ था | इस सूफी दरवेश ने मध्य एशिया के कई स्थलों पर घूमते हुए अपने जीवन का अधिकतम समय कोन्या में बिताया, इस पूरे क्षेत्र को पहले रूम के नाम से जाना जाता था | रूम में रहने के नाते मोहम्मद जलालुद्दीन ‘रूमी’ के नाम से मशहूर हुए, बाद में मौलाना जुड़ जाने से मौलाना रूमी | यहीं पर १७ नवम्बर १२७३ को उनका निधन हुआ | कहा जाता है कि, उनकी अंतिम यात्रा में पूरा रूम उमड़ पड़ा था | न केवल मुसलमान वरन बहुत बड़ी संख्या में इसाई और यहूदी भी इसमें सामिल थे | इनसे जब किसी ने पूछा कि आप सब कैसे इस यात्रा में तो उनका जवाब था, “’जैसे आपके लिए मौलाना दूसरे मोहम्मद थे वैसे हमारे लिए भी वे हमारे दूसरे मूसा और जीसस थे |””’ कोन्या में ही मौलाना रूमी ने अपनी महान रचनाएं कीं |”
“मेवलाना जामी” के नाम से मशहूर कोन्या की  दरगाह बाहर से जामी ( तुर्की में मस्जिद को जामी कहते हैं ) और अंदर से एक अद्भुत संग्रहालय है | दुनिया की सबसे बड़ी मसनवी की किताब यहाँ है और दुनिया का सबसे छोटा कुरआन यहाँ है | मौलाना रूमी की ‘दीवान-ए-कबीर’ यहाँ है | फारसी में लिखी  छः भागों में मसनवी की मूल पाण्डुलिपि सूफी अदब और दर्शन का एक नायाब अवशेष है | कहा जाता है कि मौलाना रूमी ने इसे अपने अत्यंत प्रिय मित्र और अन्तरंग सखा हुसामुद्दीन चलाबी को बोलकर लिखवाया था | दो पंक्तियों के वृत्त में लिखे गए इस मसनवी में कुल २५००० छंद हैं | सन् १२५८ में इसका पहला खंड पूरा हुआ माना जाता है और अंतिम खंड १२७३ में, मौलाना की मृत्यु के कुछ दिनों पहले | माना जाता है कि, मसनवी के अंतिम भाग ‘तीन राजकुमार’ का लेखन हसामुद्दीन चलाबी ने किया | कहा जाता है कि मौलाना रूमी ने मसनवी के छः भाग भारतीय ‘षड् दर्शन’ को आधार माननकर किया था जिसकी प्रेरणा उन्हें उनके मित्र और गुरु शम्स-ए-तबरीजी से मिली थी | शम्स-ए-तबरीज़ी का सम्बन्ध हिदुस्तान से माना जाता है जिनके पूर्वज ईरान विस्थापित होने से पहले मुल्तान में रहते थे | तबरीज़ी का बहुत गहरा असर मौलाना रूमी के साहित्य और दर्शन पर पाया जाता है | अपने इस परम मित्र और गुरु के सम्मान में रूमी ने एक पुस्तक लिखी जो ‘दीवान-ए-कबीर या दीवान-ए-शम्स-ए-तबरीज़ी’ के नाम से मशहूर है | ग़ज़लों के इस संग्रह में कुल अठारह दीवान हैं |   
इस संग्रहालय में ‘साफा’ और ‘सामा’ की मौजूद निशानियाँ सूफी दरवेशों की मलंग जीवन शैली को दर्शाती हैं | ‘समा या सामा’ नृत्य सूफियों का ऐसा नृत्य है जिसमें दरवेश तन्मय तल्लीन मुद्रा में एक वृत्ताकार परिधि में अनवरत घूमता है और अपने को भूलकर एक लहर के साथ एक नाद के संग लयमान हो जाता है | यह नृत्य सम और संतुलन, प्रेम और समर्पण का अद्भुत नमूना है | कोन्या में इस नृत्य मुद्रा की प्रतिमाएं जगह - जगह पार्कों और चौराहों पर मिल जायेंगी | यह यहाँ की पहचान है | इस संग्रहालय में सूफी संगीत के अनेकों साज देखने को मिले | मौलाना रूमी का रवाब और रीद देखा | रीद बांसुरी की तरह का एक वाद्य होता है | रवाब का जिक्र कबीर के यहाँ खूब हुआ है | पर रूमी का यह रवाब प्रचलित अरबी रवाब से भिन्न है | इसमें चार तांतों और चार छोरों की जगह छः तांत और छः छोर हैं | इसके नवता के पीछे  मौलाना रूमी का रचना – दर्शन है जिसमें जगत के छः दिशाओं का रहस्य अन्तर्निहित है |
संग्रहालय में सूफी बैठक और उनकी रसोई के दृश्य अत्यंत ही आकर्षक हैं | सूफी खल्वत देखा | खल्वत एक बहुत ही छोटी कमरेनुमा जगह होती है जिसमें दरवेश बैठकर ध्यान लगाते थे |  मंदिर और मस्जिद का इससे अच्छा उपयोग और क्या हो सकता है | मौलाना ने अपने मरने से पहले कबीर की ही तरह यह कहा था – “
“मेरे मरने के बाद धरती पर मेरी कब्र न खोजना
           मैं तो अपने आरिफ के दिलों में पाया जाउंगा |””


विनोद तिवारी
विसिटिंग प्रोफ़ेसर, अंकारा विश्वविद्यालय, अंकारा – तुर्की
फोन:+903124418757 मोबा. +9005303639128   





3 अप्रैल 2012

पक्षधर -१२


पक्षधर मेरे लिए नशा है

पक्षधर-१२ 
 मैं पक्षधर नशेड़ी हूँ | पक्षधर मेरा नशा है | मैं इस नशे का आदी हो चुका हूँ | जहाँ भी रहूँ यह नशा मुझसे छूटता नहीं, मैं इसे छोडता नहीं | नशे के बारे में कहा जाता है कि यह लत दूसरे लगाते हैं, परन्तु मैंने  इस नशे को खुद गले लगाया है | हाँ, यह जरूर था कि पक्षधर के एकांकी संपादक और तत्कालीन ‘माध्यम’ संपादक श्री सत्यप्रकाश मिश्र दोनों ने मुझे बरजने की, आगाह करने की कई कोशिशें कीं पर वे नाकाम रहे | शायद वे इसी नशे से मुझे बचाना चाहते थे | सत्यप्रकाश जी अब रहे नहीं पर दूधनाथ जी ने पत्रिका की बेहतरी के लिए उसके शुरुआती अंकों में जिस तरह अपने अनुभव से मुझे सहेजा वह मेरे लिए एक तरह की ट्रेनिंग थी | आज भी वह पत्रिका को लेकर बहुत ही सचेत रहते हैं कोई चूक हो जाती है तो इस कदर बेरुखी से झाडते हैं कि, कहते न बने | पर कभी-कभी वह यह भी कहकर छूटना चाहते हैं कि “भाई अब मुझे बख्श दो अब मैं बूढा हुआ” | दूधनाथ जी ७५ के हुए हैं, बूढ़े कहाँ हुए हैं | ७५ पूरे होने पर हम सबकी अनंत शुभकामनाएं कि वह सालों-साल गिनती में बड़े होते जाएँ पर बूढ़े न हों | दूधनाथ जी कभी-कभी किसी गलती पर इस कदर तल्ख़ होते हैं कि आपके साथ गैर से भी बदतर पेश आते हैं | दरअसल उनका ‘मम’ उस समय सब कुछ को परे कर अत्यंत ही निर्मम हो जाता है | तभी तो उनके जानने चाहने वाले कहते हैं-                  
          काम उससे आन पड़ा है,कि जिसका जहान में        
           लेवे न कोई नाम सितमगर कहे बिगैर

जब मैं बिना किसी ढोल-मंजीरे के तुर्की आने लगा तो मेरे कुछ मित्रो ने यह सवाल किया कि पक्षधर का क्या होगा? कैसे निकलेगा ? क्या अब पक्षधर बंद हो जायेगा| मैंने सबको कहा कि नहीं पक्षधर बंद नहीं होगा वह तुर्की से भी निकालता रहेगा | एक ने कहा कि “ मैं आपका उत्साह देखूंगा” | दरअसल, पक्षधर जब मैंने शुरू किया तो यह सोचकर नहीं कि, इससे मुझे क्या फायदा या नुकसान होगा | हाँ ! एक जूनून जरूर था कि नहीं, एक पत्रिका बनारस में रहते हुए शुरू की जा सकती है | उस जूनून में कहीं न कहीं पत्रिका के लिए एक बेइंतहा जिद्दी प्यार शामिल था | वह प्यार धीरे – धीरे परवान चढता गया | अब तो उसने अपने रंग में मुझे इस कदर रंग लिया है कि निकल पाता हूँ न भाग पाता हूँ –
               
               दिलकश ऐसा कहाँ है दुश्मने–जाँ
                मुद्दई है पे मुद्दआ है इश्क
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               क्या कहूँ मैं तुमसे कि क्या है इश्क
               जान का रोग है बला है इश्क
      हालाँकि, इस जिद्दी धुन ने मुझसे मेरा बहुत कुछ छीना भी है | कुछ ऐसे लम्हे, कुछ ऐसे पल, कुछऐसी हसरतें, कुछ ऐसे लोग जो मुझे प्यार करते थे, जिन्हें मैं प्यारा था | उन सबको मैंने छोड़ा
नहीं वे छूटते गए | सच में, आज जब पत्रकारिता कोई मिशन नहीं रह गयी है तो भी वह आपसे कितना कुछ वसूलती है उसको बयाँ नहीं कर सकता | जब पत्रिका नफ़ा नुकसान के व्यावसायिक तर्कशास्त्र से अलग एक जुनूनी और जिद्दी प्यार की तरह आपके जीवन और स्वभाव में उतर जाय फिर तो – ‘दिन नाहीं चैन रात नहिं निंदिया’ |

      पक्षधर को निकलते हुए पांच साल हो गये | इन पांच सालों में पक्षधर ने पाठकों की इस उम्मीद को पुख्ता किया है कि पक्षधर बंद नहीं होगा | इस बीच, पत्रिका एक नाशुक्रे की मक्कारी और छलना का भी शिकार हुई | तरह–तरह के प्रलोभन देकर वह मुझे मूसता रहा अपन पत्रिका की खातिर मुसते रहे जब मूस चुका तो दिल्ली की अनजान भीड़ में गधे की सींग की तरह ऐसा गायब हुआ कि लौट कर न आया | तौबा ! मेरी दिल्ली तेरी मक्कारी और छलनाओं से | पर तुझे भी क्या कोसना, तू भी क्या करे ऐसे न जाने कितने पेट के जले हुए मक्कार और छलियों की तू ही तो आसरा है,वर्ना वो पेट की आग लेकर जाएँ तो जाएँ कहाँ |

     कवि-कथाकार विनोद कुमार शुक्ल पचहत्तर के हो गए, वे दीर्घायु हों उनकी रचनात्मक सक्रियता बनी रहे | उनके सम्मान में पक्षधर के इस अंक में उनकी दस कवितायें और साहित्य – संस्कृति संबंधी विविध प्रसंगों पर उनसे एक लंबी बातचीत प्रस्तुत है |

     हरिओम की लंबी कविता ‘जंगल-गाथा’ से हमने लंबी कविताओं की शुरुआत की थी | पिछले अंक में निशांत की लंबी कविता ‘फिलहाल साँप कविता’ को पाठकों ने बहुत सराहा था | इस अंक में विवेक निराला की लंबी कविता ‘चार पुरुष और स्वर्ण युगों पर शोकगीत’ | इन लंबी कविताओं को आप अगर एक साथ रखकर देखें-पढ़ें तो अपने समय के साथ एक बहुत ही तल्ख संवाद करती हैं ये कवितायें | इधर युवा कवि और आलोचकों ने कविता और आलोचना के साथ कथा क्षेत्र में भी पूरी रचनात्मक ऊर्जा और ऊँचाई के साथ पहलकदमी की है | इस अंक में राकेश रंजन के लिखे जा रहे नायब उपन्यास ‘मल्लू कठफोड़वा’ के प्रारम्भिक अंश एवं अशोक कुमार पाण्डेय की कहानी ‘और कितने यौवन चाहिए ययाति ?’ को इसी नुख्ते के साथ देखा जाना चाहिए |

आशा है कि हर अंक की तरह इस अंक को भी पाठकों का प्यार मिलेगा | मेरे लिए तो हर अंक बहुत ही मुश्किलातों भरा होता है | इस अंक के लिए तेजभान ने बहुत परिश्रम किया है | परदेश में रहते हुए बिना उनके सहयोग के यह संभव नहीं था |
                                                              

                                           विनोद तिवारी