30 मार्च 2013

एस्पेंदोस : बीते कल की उतरती भव्य सीढ़ियाँ



समकालीन सरोकार, मार्च २०१३
एस्पेंदोस : बीते कल की उतरती भव्य सीढ़ियाँ         
विनोद तिवारी
पिछले दिनों प्राचीन रोमन साम्राज्य और अब तुर्की गणराज्य के एक राज्य ‘अनातोलिया’  की यायावरी पर निकला था | अनातोलिया प्राचीन ग्रीको-रोमन सभ्यता और संस्कृति का वह भूभाग है जो अपने तमाम तवारीखी चिन्हों और प्रमाणों के साथ आज आधुनिक तुर्की का हिस्सा है | इस   प्रदेश का प्रमुख नगर है ‘अंताल्या’|  यह महानगर अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान के नाते तुर्की की सांस्कृतिक राजधानी भी है | भूमध्य-सागर के किनारे बसा यह नगर अपनी प्राकृतिक सुंदरता के कारण  पिछले साल विश्व के पर्यटन स्थलों में न्यूयार्क को पीछे धकेल कर तीसरे स्थान पर काबिज हो गया | योरोप के सैलानियों का यह अत्यंत ही पसंदीदा जगह है | हम कश्मीर-घाटी के बारे में सुनते आये हैं कि, वहाँ की प्राकृतिक छटा पर मन्त्र-मुग्ध होकर मुग़ल बादशाह जहाँगीर के मुंह से बेसाख्ता निकला था – “गर फिरदौस बर-रू-ए ज़मीन अस्त/हमीं अस्त, हमीं अस्त (धरती पर यदि कहीं स्वर्ग है तो वो यहीं है, यहीं है) |” सचमुच वह है भी, पर अंताल्या को देखने के बाद लगा कि नहीं पौराणिक-कथाओं में भले ही एक ही स्वर्ग – देवताओं वाले स्वर्ग – की कल्पना की गयी हो पर धरती पर एक नहीं अनेक स्वर्ग हैं | अंताल्या की प्राकृतिक सुंदरता के कारण ही इसे ‘धरती का स्वर्ग’, ‘भूमध्य-सागर का मोती’ और ‘तुर्की का रिवेरा’ कहा जाता है | इस नगर की स्थापना के पीछे जो पुराना किस्सा प्रचलित है वह यह है कि, पेर्गियन राजा अतालोस-द्वितीय ने एक समय यह राजाज्ञा जारी की और अपने मातहतों को चारों दिशाओं में भेजा कि जाओ और मेरे लिए इस धरती पर जो सबसे सुन्दर जगह हो उसकी तलाश करो जिसे देखकर दूसरे राजा इर्ष्या करें | चारों दिशाओं में सैनिक भेज दिए गए | वे घूम-घूम कर एक से एक सुन्दर जगह की तलाश करते और राजा से उसका बखान करते पर राजा को जगह पसंद नहीं आती | दिन, महीने, साल बीतते गए राजा को कोई जगह पसंद न आये | अंत में सैनिक थक हार-कर भूमध्य-सागर के किनारे पहाड़ों और पेड़ों से घिरी एक घाटी में आराम करने के लिए रुके | कुछ ही समय में उनकी थकान जाती रही | उनके सेनापति ने इस जादू का निरिक्षण करना शुरू किया | उस जगह को देखकर वह अभिभूत हो उठा | उसने मन ही मन पक्का कर लिया कि यह जगह अतालोस-द्वितीय को जरूर पसंद आयेगी | वह राजा के पास आया और उसने भूमध्य-सागर के किनारे की इस प्राकृतिक छटा का वर्णन राजा से किया | राजा ने इस सुंदरता खुद चलकर देखने की इच्छा जाहिर की | जब वह सैनिकों के साथ वहाँ पहुंचा तो वहाँ की प्राकृतिक सुंदरता को देखकर दंग रह गया | भूमध्य-सागर का अथाह, अछोर नील-विस्तार उसके ऊपर आसमान का नीला परिधान जिसका किनारा पीताभ-रेत से रंगा हुआ, दूर तक पहाड़ियों और प्राकृत हरे-भरे पेड़-पौधों की निर्मल, बेदाग़ और आकृष्ट करने वाली सुंदरता ने अतालोस-द्वितीय को इस कदर मोहित किया कि उसने तुरंत आदेश जारी किया कि स्वर्ग की तरह इस अत्यंत मनोरम जगह पर शीघ्र ही सर्व-सुविधा-संपन्न नगर का निर्माण कराया जाय | निर्माण के बाद राजा के सम्मान में इस नगर का नाम रखा गया – ‘अत्तालिया’ (या अट्टालिया) | बाद में यही अत्तालिया अंताल्या हो गया |
पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर पुरातत्वविद यह मानते हैं कि यह भूखंड आद्य-ऐतिहासिक पलियोलिथिक-युग में ‘पाम्फिलिया’ का हिस्सा रहा होगा | अंताल्या के राष्ट्रीय संग्रहालय में सेरामिक और पत्थर के जो भांड रखे गए हैं उनके आधार पर पुरातत्वविद इसके निर्माण का समय 3000 B.C. मानते हैं, कांस्य-युग के पहले | ईसा-पूर्व तेरहवीं शताब्दी से यहाँ हित्ती-साम्राज्य का इतिहास मिलने लगता है | ईसा-पूर्व छठी शताब्दी में यह फारसियों के अधिकार में आता है और ईसा-पूर्व ३३४-३३ में सिकंदर के आक्रमण से पूर्व तक उनके अधिकार में रहता है | ईसा-पूर्व ३३४-३३ में यहाँ सिकंदर महान के नेतृत्व में यूनानी-साम्राज्य का परचम लहराता है | सिकंदर की मृत्यु के बाद उसके सेनापतियों, पहले एन्तिगोनस और उसके बाद टालेमी यहाँ शासन करते हैं | बाद में यह ईसा-पूर्व ७७ में रोमनों के आधिपत्य में आता है और आजकल तुर्की गणराज्य का हिस्सा है | यह तो रहा अंताल्या का एक संक्षिप्त ऐतिहासिक परिचय |
हमने अंताल्या शहर के अलावा उससे लगे कई महत्वपूर्ण एतिहासिक स्थलों को देखा | इन्हीं ऐतिहासिक स्थलों में एक महत्वपूर्ण अवशेष ‘पेर्गे’ है | अंताल्या से १७ किलोमीटर पूरब  हेलिनिस्टिक सभ्यता की निशानी और आक्सू नदी के किनारे बसी पाम्फिलिया की राजधानी ‘पेर्गे’ | आज ‘पेर्गे’ एक ध्वन्साशेष खँडहर मात्र है और आक्सू नदी अस्तित्व में नहीं है | परन्तु, इन ध्वन्साशेष खंडहरों को देखकर अनुमान किया जा सकता है कि इनका स्थापत्य अपनी भव्यता और गौरव के चलते कितना आकर्षक रहा होगा | ग्रीको-रोमन साम्राज्य की वास्तुकला का अद्भुत नमूना | पेर्गे का ईसाईयों के लिए तीर्थ जैसा महत्व है | ईसाई धर्म के महत्वपूर्ण प्रचारक और अपने को ईसा का शिष्य मानने वाले सेंट पॉल ने यहीं आक्सू नदी के किनारे बैठ कर ‘न्यू टेस्टामेंट’ का लेखन पूरा किया | इसलिए यह नगर और नदी ईसाईयों के लिए एक पवित्र स्थल है | वे पूरी श्रद्धा के साथ आज भी पेर्गे को उसी रूप में महत्व देते हैं | मशहूर पेर्गेनियंस में प्रसिद्ध गणितज्ञ और ज्योतिर्विद अपोलोनियस का नाम आता है | अपोलोनियस के अलावा महान दार्शनिक वारुस का भी पेर्गे से सम्बन्ध था | पेर्गियन साम्राज्य अपने सांस्कृतिक-वैभव के लिए मशहूर था | कला, दर्शन और साहित्य-संस्कृति का स्वर्णिम काल | वैसे भी प्राचीन-विश्व के सांस्कृतिक इतिहास में अपनी उन्नत सुरुचि और कलात्मक-अभिज्ञान में यूनान, मिस्र, रोम और हिदुस्तान का ही नाम आता है | पेर्गे को देखकर ग्रीको-रोमन भव्यता और गौरव का भान होता है | बाद में पता चला कि यहाँ कई हिन्दी फिल्मों की शूटिंग हो चुकी है | कई हिन्दी फिल्मों के गाने यहाँ फिल्माए गए हैं |
पेर्गे के ध्वन्साशेष खंडहरों में कुछ अवशेष आज भी बचे हुए हैं, तुर्की सरकार ने उनको यथावत सुरक्षित रखने का हर जतन किया है और उनको उपयोग में लाया जाना संभव किया है | ऐसे ही जतन से बचायी गयी एक जो सबसे महत्वपूर्ण जगह है वह है 2000 साल पुराना मुक्ताकाशी थियेटर ‘एस्पेंदोस’ | प्राचीनतम रोमन थियेटरों में से एक जो आज भी अपने अतीत-गौरव के साथ अपनी भव्यता और उत्कर्ष के दिनों की कहानी बयां करता है | रोमन कॉमेडी, ट्रेजेडी और एटलान   नाटकों के भव्य इतिहास और संस्कृति की गवाही देता भव्य निर्माण | कल्पना कीजिये कि इस थियेटर में जब लिवियस अन्द्रोनिकस, प्लाउतस, टेरेन्स, सेनेका, एनेनियस, होरेस, सिसरो आदि महान कवि-नाटककारों को जब प्रस्तुत किया जाता रहा होगा तो क्या भव्यता रहती होगी | ‘एस्पेंदोस’ के बारे में जी.ई. बीन ने लिखा है कि, “........अब तक मैंने जो कुछ देखा है इसके जैसा कुछ भी नहीं |” प्रसिद्द ब्रिटिश पुरातत्वविद डी.जी. होगैर्थ का कहना है, “आपने इटली, फ़्रांस, यूनान इत्यादि में वास्तुकला के बहुत ही आकर्षक नमूने देखे होंगे पर इस थियेटर जैसा वे नहीं हैं |” ‘एस्पेंदोस’ एशिया और अफ्रीका में रोमनों द्वारा निर्मित थियेटरों में सबसे प्राचीन ऐसा थियेटर है जो आज भी सुरक्षित है और अभिनय के लिए उपलब्ध है | इसका निर्माण 161-180 ईस्वी में रोमन सम्राट मारकस आरेलियस के समय में हुआ | इसका वास्तुविद् था मशहूर रोमन वास्तुकार जेनो | थियोडोरस का बेटा जेनो | बाद में राजकुमारी का विवाह जेनो के साथ हुआ | कहा जाता है कि, रोमन सम्राट मारकस ने यह घोषणा प्रसारित करवाई थी की मैं दो ऐसे निर्माण करना चाहता हूँ जो राज्य के लिए सबसे लाभप्रद और सुन्दर हो | जिसे लोग देखें तो देखते रह जायं | इनमें से जो सबसे सुन्दर होगा उसको बनाने वाले कलाकार से मैं अपनी बेटी का विवाह करूँगा | दो वास्तुविदों ने दो तरह के निर्माण किये | एक ने एक ऐसा जलाशय तैयार किया जो पूरे नगर को जल उपलब्ध करता था पर जिसके जलस्रोत का पता लगाना मुश्किल था | दूसरे ने एक ऐसा विशाल मुक्ताकाशी थियेटर बनाया जो अपने वैज्ञानिक और कलात्मक उत्कर्ष का अद्भुत नमूना है | राजा ने दोनों को देखा और उसे जलाशय पसंद आया | वह राजकुमारी को जलाशय बनाने वाले कलाकार के साथ ब्याहने का इच्छुक था | पर कहा जाता है कि, राजकुमारी थियेटर को देखकर इतना मुग्ध हुयी की उसको बनाने वाले कलाकार से वह मन ही मन प्यार करने लगी | राजा को जब यह पता लगा तो उसने यह निश्चित किया की वह एक बार दोबारा थियेटर का निरीक्षण करेगा | राजकुमारी भी अपने पिता के साथ थी | वे दोनों जब बैठने के लिए शिलाओं से बनी अर्ध-वृत्ताकार अति-विशाल सीढियों पर चढ़ते हुई सबसे ऊपर पहुंचे तो नीचे सबसे बीच में मंच वाली जगह पर जेनो अपने एक दूसरे सहयोगी से कह रहा था “यह राजकुमारी मुझे चाहती है, यह मेरी है |” जेनो ने यह बात अत्यंत ही धीमी आवाज में कही थी पर इसको सबसे ऊपर खड़े राजा और राजकुमारी ने साफ़-साफ़ सुना | राजा आश्चर्य से भर उठा | ध्वनि संबंधी थियेटर की इस अद्भुत वास्तु-क्षमता ने राजा को अभिभूत कर दिया उसने तुरंत अपना निर्णय बदलते हुए यह घोषणा की कि, वह अपनी बेटी का विवाह जेनो के साथ करेगा | और उन दोनों का विवाह उसी थियेटर में भव्य राजसी वातावरण में संपन्न हुआ | आज भी थियेटर में ध्वनि के लिए अत्याधुनिक यांत्रिक उपकरणों की जरूरत नहीं पड़ती |
यह मुक्ताकाशी थियेटर अपनी अद्भुत वास्तुकला से आज भी लोगों को आकर्षित करता है | इसकी खोज ट्रोजन युद्ध के बाद तेरहवीं शताब्दी में हुआ जब तुर्की पर सेल्जुक तुर्कों का शासन था | खोज के बाद इस अद्भुत वास्तु की मरम्मत प्रसिद्द सेल्जुक शासक अलादीन कैकुबाद-प्रथम ने कराया | पुनः बीसवीं शताब्दी में तुर्की गणतंत्र के संस्थापक मुस्तफा कमाल अतातुर्क ने इसकी मरम्मत और साज-सज्जा कराकर इसे उपयोग में लाने लायक बनाया | 15 से 20  हज़ार तक लोगों को अपने अंदर स्थान देने वाले इस मुक्ताकाशी थियेटर में आज भी प्रति वर्ष तुर्की सरकार  ‘अन्तराष्ट्रीय ओपेरा और बैले महोत्सव’ का आयोजन करती है | आज भी इस थियेटर में पूँजीपति और प्रभु-वर्ग के लोगों के वैवाहिक समारोह संपन्न होते हैं |  विश्व भर में होने वाले ओपेरा और बैले उत्सवों में जो शीर्ष दस उत्सव हैं उनमें ‘एस्पेंदोस अंतर्राष्ट्रीय ओपेरा और बैले महोत्सव’ पांचवें स्थान पर है | जून के महीने में होने वाले इस महोत्सव में दुनिया भर से दर्शक आते हैं | सत्तर प्रतिशत दर्शक बाहरी ही होते हैं | दुनिया भर की टीमें यहाँ प्रस्तुति के लिए आती हैं | इसबार का महोत्सव 22 जून से शुरू होगा | मैंने कार्यक्रम बनाया है कि इसबार एस्पेंदोस का ओपेरा और बैले महोत्सव जरूर देखूं |
‘एस्पेंदोस’ के अतिरिक्त जो एक अन्य जगह आज भी सुरक्षित है वह है पेर्गे का स्टेडियम (स्तेदियोन) | ‘एस्पेंदोस’ थियेटर के उत्तर में कुछ ही दूरी पर बना यह स्टेडियम अपनी वास्तुकला में थियेटर जैसा ही है | इसमें 12 हज़ार लोग एक साथ बैठ सकते हैं | इन अलहदा निर्मितियों से रू-ब-रू होते हुए, बीते कल की इन उतरती भव्य सीढ़ियों को देख कर अपनी हस्ती में पैबंद रहते हुए शायर की उस कहन पर थोड़ा ठिठकना पड़ता है जिसमें वह कहता है – “यूनान मिस्र रोमा सब मिट गए जहां से” |
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युवा आलोचक | पक्षधर पत्रिका का संपादन-प्रकाशन | दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी का अध्यापन | आजकल अंकारा विश्वविद्यालय, अंकारा (तुर्की) में विजिटिंग प्रोफ़ेसर |
ई-मेल :  tiwarivinod4@gmail.com फोन:+903124418757 मोबा. +9005303639128   





26 मार्च 2013

पक्षधरवार्ता: पक्षधर का नया पता

पक्षधरवार्ता: पक्षधर का नया पता

पक्षधर का नया पता

पक्षधर के सभी चाहने वालों, पाठकों, लेखकों, सहयोगियों को होली की ढेर सारी शुभकानायें | साथ ही एक जरूरी सूचना | पक्षधर का पता बदल गया है | अतः रचनाएं, पत्र, सहयोग राशि कृपया नीचे दिए गए पते पर ही भेजें |
पक्षधर का नया पता है –
विनोद तिवारी
संपादक: पक्षधर
सी-4/604, जीएच-9 ऑलिव काउंटी
सेक्टर-5, वसुंधरा, गाजियाबाद-201012(उ.प्र.)
 
E-mail : pakshdharwarta@gmail.com

15 फ़रवरी 2013

सम्पादकीय , पक्षधर-१३


सम्पादकीय , पक्षधर-१३
साहित्यिक पत्रकारिता का वर्तमान

  कहा जाता है कि साहित्य के निर्माण और विकास में साहित्यिक-वातावरण का एक विशेष महत्व होता है | साहित्यिक-वातावरण जैसा होगा उस समय का साहित्य भी वैसा ही होगा | किसी भी देश और समाज में सहितियिक-वातावरण का निर्माण करने वाले कारकों में साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं की भूमिका निस्संदेह नेतृत्वकारी होती है | एक ओर पत्र-पत्रिकाएं जहाँ साहित्यिक-वातावरण को बनाने और प्रचारित-प्रसारित करने का काम करती रही है तो दूसरी ओर उसे अनुशासित भी करती रही हैं | शुरू से ही साहित्यिक पत्रकारिता यह दोहरी भूमिका निभाती रही है | पर इस समय यह सवाल है कि वर्तमान साहित्यिक पत्रकारिता कौन सी भूमिका में है ? साहित्यिक पत्रकारिता का वर्तमान क्या है ? नवजागरण के दौर में साहित्यिक पत्रकारिता एक मिशन की तरह काम कर रही थी | आजादी के बाद शीत-युद्ध के ज़माने में साहित्यिक-वातावरण साफ़-साफ दो खेमों में बंटा हुआ था | साहित्यिक पत्रकारिता के मोर्चे दोनों खेमों की ओर से खुले हुए थे | बहस-मुबाहिसे, वाद-विवाद, सहमति-असहमति को एक चुनौती की तरह लिया जाता था | साहित्यिक और  क्रियाशील दौर था | आपातकाल का दौर आता है जो कि निस्संदेह एक दृष्टि से पत्रकारिता के लिए निर्भीक साहसिकता का दौर था तो दूसरी दृष्टि से एक स्याह और संदेहकारी दौर | लघु-पत्रिका आंदोलन ने साहित्यिक पत्रकारिता के लिए नए तरह के अवसर पैदा किये | सांस्थानिक वर्चस्व और फायदे-नुकसान वाली पत्रकारिता से अलग एक जनतांत्रिक-स्व और रुझान के साथ सामूहिक सहकार के जज्बे वाली पहलकदमी | पर धीरे-धीरे यह दौरा-दौर खत्म हुआ | जो साहित्यिक बहस-मुबाहिसे का वातावरण बना था वह वातावरण कहाँ गया ? सहमति/असहमति के जो सामानांतर मंच थे वे मंच कहाँ चले गए ? कहीं ऐसा तो नहीं कि सहमति/असहमति का झगडा ही खत्म हो गया | तुम सहमत हो तो हम भी तुमसे सहमत हैं, तुम असहमत हो ठेंगे से | तुम अपने घर दाल-रोटी खाओ हम अपने घर | आज साहित्यिक पत्रकारिता की दिशा क्या है ? उसका लक्ष्य क्या है ? इस पर कुछ कहना और बातचीत करना एक गैर जरूरी बहस लग सकती है ठीक वैसे ही जैसे आजकल अन्य मुद्दों और मसलों पर बातचीत करना गैर जरूरी मान लिया गया है | जो करता भी है उसे अपरिपक्व मान कर यह कहा जाता है कि अभी उसके अंदर समझदारी विकसित नहीं हुयी | दरअसल, ऐसी बहसें ऐसे मुद्दों पर बातचीत अब स्वयं को व्यावहारिक और परिपक्व कहने-मानने वाले लोगों के प्रतिकूल पड़ती हैं | इसका कारण है कि अब उन्होंने अपने अनुभव से यह जान लिया है कि समझदारी क्या है | इसलिए वे सबकुछ को टालते-छोड़ते जाने की सुरक्षित रणनीति अपनाते हैं | मूँदहु आँखि कतहुँ कछु नाहीं |
जिस तरह से साहित्यिक–वातावरण के निर्माण में साहित्यिक पत्रकारिता की भूमिका निर्विवाद है उसी तरह साहित्यिक पत्रकारिता के लिए साहित्यिक वातावरण जिम्मेदार है | दोनों में अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है | अधीरता, अराजकता, घाल-मेल, छद्म महानता की निरर्थक आत्मुग्धता, व्यक्तिवादी मैकेनिज़्म, लोभ-लाभ की छिछोरी क्षुद्रताएं, एक कातर और दयनीय समर्पण, सामूहिक-सहकार का न होना आज के साहित्यिक वातावरण का स्वभाव बन गया है | इसके लिए कोई एक कारक तत्व नहीं है बल्कि अनगिनत तत्व इसके कारक हैं | इन सबका प्रभाव जहाँ एक ओर साहित्यिक पत्रकारिता पर पड़ना लाजिमी है वहीं दूसरी तरफ उक्त वातावरण के निर्माण में साहित्यिक पत्रकारिता की भूमिका की  भी पड़ताल होनी चाहिए | आज मोटे तौर पर साहित्यिक पत्रकारिता की  चार तरह कि कोटियाँ बनाई जा सकती है :
1.    पहली कोटि उन पत्रिकाओं की है जो यथास्थिति को बरकार रखते हुए चलते चले जाने की निरंतरता में विश्वास रखती है |
2.    दूसरी कोटि की पत्रिकाएं वे हैं जो एक तरह का साहित्यिक-सांस्कृतिक धुन्ध फैला कर घालमेल करती हैं |
3.    तीसरी तरह की पत्रिकाएं वे हैं जो हिट होने के लिए तरह-तरह के बाजारू नुस्खे अपनाती है और सेंसेशन फैलती रहती हैं |
4.    चौथी कोटि उन पत्रिकाओं की है जो अपने को सर्वोच्च मानकर व्यक्तिवादी साहित्यिक अहंवाद के चलते एक खास तरह के मैनेरिज्म का शिकार हो जाती हैं |
पहली श्रेणी में अधिकांश वे संस्थानिक पत्रिकाएं है जो सांस्थानिक और सांगठनिक हैं और जो संस्थान व संगठन की नीतियों और मानदंडों पर निकलते चले जाने के लिए अभिसप्त हैं | जहाँ से जिससे जैसा भी जो मिले सबको परोसते रहना | दूसरी श्रेणी की पत्रिकाओं का लक्ष्य होता है घाल-मेल करना | राष्ट्र, राष्ट्रिय साहित्य, कला-विमर्श, दर्शन और अध्यात्म इत्यादि को एजेंडे पर रखते हुए वे एक ऐसा साहित्यिक-सांस्कृतिक धुंध निर्मित करती हैं जिसमें वर्तमान और तात्कालिक मुद्दे ओझल बने रहें | जो तीसरी श्रेणी है उसमें सांस्थानिक और यदा-कदा झलक मारने वाली पत्रिकाएं हैं | ये पत्रिकाएं हिट होने के लिए कुछ भी करने को तैयार होती हैं | इधर सुना है कि एक पत्रिका ने ठेके पर लेखन कार्य शुरू कराया है | पत्रिका के संपादक के घर रात्रिभोज में लेखक और संपादक में साहित्यिक वर्तमान को लेकर चर्चा चलते-चलते खुद एक दूसरे की चर्चा परिचर्चा पर केंद्रित हो जाती है | लेखक संपादक से कहता है कि तुमसे तो अब कहानी छूट गयी | संपादक का पलट जवाब होता है कि छूटी तो वह तुमसे भी है कौन सा वह तुम्हीं से सध रही है | लेखक फनफना कर कहता है नहीं-नहीं मैं तो अभी चाहूँ तो दर्जन भर कहानियाँ तुम्हारे मुंह पर मार सकता हूँ | संपादक इस अवसर को तुरंत पकड़ता है जाने नहीं देता | अगर ऐसी बात है तो लगी शर्त, तुम मुझे दर्जन भर कहानियां दो मैं उन्हें हर महीने छापूंगा | प्रति कहानी पांच हज़ार रूपये पक्का, चाहो तो साठ हज़ार एकमुश्त एडवांस अभी ले लो | बस बात पक्की | अब हर महीने कॉलम की तरह कहानी छप रही है | किसको फ़िक्र है कि पाठक के ऊपर क्या बीत रही है | जो चौथी कोटि है पत्रिकाओं की वह अपनी सर्वोच्चता के व्यक्तिवादी अहम् में स्वयं के सम्मोहन से मुक्त नहीं हो पाती हैं | व्यवहार ऐसा अलोकतांत्रिक की पूछिए मत |  ऐसी पत्रिकाओं के संपादक तरह-तरह के प्रपंच रचते छद्म बुर्जुआजी का खेल खेलते रहते हैं | वे एक खास तरह की ‘टेरेटरी’ बनाते हैं जिसमें धीरे-धीरे पत्रिका खुद एक तरह के मैनेरिज्म का शिकार हो जाती है | इस प्रकार अपना ही सत्य अपने ही विरोधी सत्य में दम तोड़ देता है |
इस बीच यह सुखद सूचना है कि ‘पहल’ का प्रकाशन फिर से हो रहा है | जब पहल के बंद होने की घोषणा हुयी थी तो खूब रोदन-मोदन हुआ था | मैं उन दिनों बनारस में था | मैंने अपने एक वरिष्ठ मित्र से पूछा था, “क्या आपको लगता है कि ज्ञान जी बिना पहल के जी सकेंगे |” जैसा कि उनकी आदत है वह प्रश्न का जवाब प्रश्न में ही देते हैं कहा था, “आपको क्या लगता है कि पहल हमेशा के लिए बंद हो जाएगी ?” मैं भी तो यही जानना चाहता हूँ मैंने कहा | “तो जो आप जानते हैं  उसको मुझसे क्यों कहलवाना चाहते हैं |” उनका जवाब था | दरअसल, उन मित्र से मैंने उसी समय कहा था कि, ज्ञान जी न तो पहल को बंद कर पाएंगे और न ही उसे लंबे समय तक स्थगित रख पाएंगे | किसी दूसरे के हाथों तो सुपुर्द करने का सवाल ही नहीं उठता | वे एक थकान के बाद उसे पुनः शुरू करेंगे | थकान भी कैसी यह कह पाना मुश्किल है | हाँ, चलते-चलते उन मित्र ने एक बात कही - “थकान की बात तो मैं नहीं जानता पर ज्ञान जी इस समय पत्रिका को लेकर एक खास तरह की मेलानकोलिया के शिकार हो गए हैं | उससे जब उबरेंगे पत्रिका फिर से निकलने लगेगी |” उस समय तत्काल मैं उनकी बात समझ नहीं पाया था | वह  कहा जाता है न कि, “राजा की जान कहाँ बसती है तो सुग्गे में |” पहल और ज्ञान जी का कुछ ऐसा ही रिश्ता है | हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता और पाठकों के लिए निस्संदेह यह एक मुबारक सूचना है | हम पहल के पुनः प्रकाशन का स्वागत करते हैं | परन्तु अचानक बंद करने और एक छोटे से अंतराल के बाद पुनः शुरू करने के पीछे कौन सी मनःस्थिति थी/है यह सवाल पहल के पाठकों  और उसको चाहने वाले लोगों के मन में अपनी जगह कायम है | क्योंकि, हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता में पहल ने जो मकाम कायम किया था यह सुनकर लोगों को तेज झटका लगा था कि ‘पहल’ बंद पत्रिका अब बंद हो रही है |
मुझे याद है नयी सहस्राब्दि शुरू होने पर ‘आलोचना’ को पुनः शुरू किया गया, पुनर्नवा अंक निकला | नामवर जी ने बड़ी ही ऐतिहासिक जिम्मेदारी के साथ रणनीतिक ढंग से एक नए ढंग के उभरते फासीवादी वातावरण पर चोट करते हुए सम्पादकीय लिखा | नामवर जी से जब ‘आलोचना’ की इस नयी पारी के सम्बन्ध पर पूछा गया था तो उन्होंने जो जवाब दिया वह काफी आश्वस्ति से भरा स्पष्ट जवाब था, “अब अपने मुंह से कहना ठीक नहीं है, लेकिन मुख्य रूप से भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में राजग की सरकार जिस तरह से बनी और उसके बनने के बाद जिस तरह अमेरिकी साम्राज्यवाद से इस सरकार का गठजोड़ हुआ और जो नयी आर्थिक नीतियां चलीं और उसके साथ-साथ शिक्षा, संस्कृति के क्षेत्र में सीधे हस्तक्षेप करते हुए उसे हिंदुत्व के रंग में रंगने की कोशिश हुयी उसके फलस्वरूप मैंने देखा कि साहित्यकारों, संस्कृतकर्मियों और बुद्धिजीवियों का वही तबका जो कुछ वर्षों से बिलकुल दबा हुआ था खुलकर सामने नहीं आ रहा था, आक्रामक मुद्रा में आ गया है | पहले वो सुरक्षात्मक लड़ाई लड़ रहे थे अब आक्रामक और कुछ उत्सव मनाने कि मुद्रा में हैं कि हमारा ज़माना आ गया है | यही नहीं बल्कि इस तरह कि पत्रिकाओं की संख्या बढ़ गयी है | कुल मिलाकर लग रहा है कि लगभग एक तरह से उसी कि आवृत्ति हो रही है जो जर्मनी और इटली में ३० के दशक में हुयी थी | तब पूरे यूरोप में फ़ासिज़्म की लहर आयी हुयी थी | तो मुझे कुछ-कुछ महसूस हुआ कि उसी की पुनरावृत्ति यहाँ नए वातावरण में हो रही है | यह महसूस तो इतिहास और  राजनीति विज्ञान के लोग भी कर रहे थे लेकिन साहित्य में कोई नहीं कह रहा था कि फ़ासिज़्म है | आज भी बहुत लोग यह मानने को तैयार नहीं हैं कि जिस फासीवाद के विरूद्ध हमने यह अंक निकाला वह वजूद में है कि नहीं | इस पर भी लोग प्रश्नचिन्ह लगा रहे हैं | तो मैंने सोचा कि कम से कम यह सवाल तो उठाया ही जाना चाहिए कि यह खतरा है और दूर नहीं है बल्कि हमारे सामने है | मैं तो मानकर चलता हूँ कि आलोचना के एजेंडा पर यह मुख्य मुद्दा है और जबतक आलोचना निकलेगी हर अंक में इस पर कुछ न कुछ हम देते रहेंगे | मेरे सामने यही एक ही मुद्दा है और कोई मुद्दा नहीं है | साहित्य, संस्कृति की सारी समस्याएं इसी के तहत हैं यह मैं मानकर चलता हूँ | यह संघर्ष तो लंबा है और चलेगा | एक दिन में खत्म होने वाला नहीं है | मुझे खासतौर से इसलिए लगा कि जो अन्य पत्रिकाएं हैं जैसे उदाहरण के लिए ‘सोशल साइंटिस्ट’ में इस पर लगातार लिखा जा रहा है | देखकर आश्चर्य होता है कि ‘सोशल साइंटिस्ट’ में तो हो रहा है, ‘फ्रंटलाइन’ लगातार यह काम कर रही है लेकिन जो भाषाई पत्रकारिता है और साहित्यिक पत्रकारिता है उस मोर्चे पर जितना तीव्र संघर्ष होना चाहिए नहीं हो रहा | जहाँ तक वामपंथ और उसकी पार्टियों का प्रश्न है उनके सामने और भी बड़े मुद्दे हैं | मैं नहीं मानता कि वो साहित्य और संस्कृति को गौण समझते हैं | लेकिन यह है कि और भी मुद्दे हैं, दूसरे फोरम हैं, पार्लियामेंट है | जनता के बीच, जन संगठनों के बीच काम करने के लिए उनकी अपनी लड़ाईयां हैं और वे लड़ेंगे | लेकिन साहित्य संस्कृति में जो काम करने वाले लोग हैं उन्हें एक मंच पर लाकर इसके विरूद्ध और केवल नारे के रूप में नहीं बल्कि तथ्यों को सामने ले आना, उन तथ्यों का विश्लेषण करना और इस बीच जो साहित्य लिखा जा रहा है उसकी समीक्षा के माध्यम से बताना की कहाँ-कहाँ यह प्रवृत्तियां दिखाई पड़ती हैं, ‘आलोचना’ का काम होगा |”
निश्चित ही इस घोषणापत्र को एक सार्थक पारी का, सपने का घोषणापत्र माना जा सकता है | पर वही नामवर जी ‘हंस’ के सिल्वर जुबिली जलसे में बोलते हुए ‘हंस’ के साथ-साथ ‘आलोचना’ के क्षय को बयां कर चुके हैं | उस गोष्ठी में, जैसा कि नामवर जी का अंदाजे-बयां होता है, उन्होंने खरामा-खरामा वह सब कहा जो किसी बहाने से वे कहना चाहते थे | जो उनके अंदाज को समझते हैं, वह खूब समझते हैं | राजेन्द्र जी भी खूब समझ रहे थे- ‘धोए गए हम ऐसे कि बस पाक हो गए |’
 क्षमा किया जाय पर लब्बो-लुवाब यही है और यही साहित्यिक पत्रकारिता का वर्तमान है जो निश्चित ही निराशाजनक है | नए प्रश्नों, नए विचारों, नए आन्दोलनों, नयी प्रवृत्तियों के नेतृत्वकारी उत्तरदायी भूमिका की दृष्टि से यह साहित्यिक पत्रकारिता का शून्य-काल है | कई मायनों में एक तरह का अवसाद-काल |

विनोद तिवारी




 

12 जनवरी 2013

समकालीन सरोकार, जनवरी, २०१३,



समकालीन सरोकार, जनवरी, २०१३,
बाहरी दुनिया

समय के खुले हुए सिरे पर

विनोद तिवारी  

 

अपने ठोस वास्तविक अर्थ में ‘आजादी’ शब्द अत्यंत ही मोहक है पर उसको उसी वास्तविक अर्थ में पाना इस पर निर्भर है कि समाज में हमारे अधिकार क्या हैं | - सिमोन विल
  
समय के खुले हुए एक सिरे पर स्त्री है – अपनी सारी सामजिक अस्मिताओं में अंततः अकेली, दूसरे सिरे पर समाज – अपनी तथाकथित समूची लोकतांत्रिकता में विधि-निषेधों का मजबूत तंत्र | समाज अपने सिरे को हमेशा एक तनाव दिए रहता है, ढील का मतलब दूसरे सिरे पर इस तनाव में कसी स्त्री की स्वतंत्रता, आजादी, उछृंखलता, बिगड़ना और न जाने क्या-क्या | ‘जिमि स्वतंत्र होहिं बिगरहिं नारी’ | नियंत्रण, वर्जनाएं, विधि-निषेध, प्रताड़ना, बलात्कार, शोषण आदि के जितने रूप हो सकते हैं, स्त्री इन सबको बेपनाह घुटन और पीड़ा के साथ जीने के लिए अभिशप्त है | स्त्री के हित में अधिकारों और क़ानून के तमाम वैश्विक उपायों, सभ्यता के तथाकथित उदार सैद्धांतिक नीतियों, सामजिक संगठनों की बदस्तूर भागीदारी और रस्साकशी के बावजूद एक स्त्री अपने स्त्री होने को लेकर बराबर असुरक्षा क्यों महसूस करती है ? क्यों उसके हिस्से बर्बर हिंसा और जघन्य अत्याचार आता है ?  जब यह लेख लिखना शुरू ही किया था तभी शर्मसार कर देने वाली खबर दिल्ली से मिली | एक नहीं दो नहीं छह युवकों ने एक २३ साल की मेडिकल की छात्रा के साथ मनुष्यता को घृणित करने वाला जो सामूहिक कुकृत्य किया उसे सुनकर कौन कह सकता है कि हम सभ्य समाज में रह रहे हैं | इस कदर वासना की भूख तो जानवर भी पूरी नहीं करता | स्त्री की पीड़ा का छोर अनंत है | वह बहुआयामी है | घर-बाहर चारों ओर | बाहर वह अपने पूरे सामजिक-राजनितिक वजूद के बावजूद पहले केवल एक स्त्री है जिस पर पुरुष अपना अधिकार समझता है | एक पुरुष का यह अधिकार और शासक-भाव किसी न किसी रूप में घर के अंदर भी पसरा रहता है | पुरुषार्थ और मर्दानगी के नाम पर एक खौफ बनकर | अब तो मर्दानगी और पुरुषार्थ जैसे शब्दों को उनकी पूरी सत्ता और इयत्ता के साथ शब्दकोष से बाहर कर देना चाहिए | अब सवाल केवल पितृसत्ता (पैट्रियार्की) का नहीं है उससे गंभीर मसला मर्दानगी (मैस्कुलेनिटी) का है |
स्त्रियों के लिए इस तरह का जघन्य कृत्य किसी भौगोलिक सीमा में बंद नहीं है | कमोवेश वह हर जगह हर शै में मौजूद है | भूगोल बदल जाने से इतिहास बदल जाय यह जरूरी नहीं | और अपनी मूल संरचना में कई बार इतिहास की सच्चाई वही रहती है भूगोल के बदलने से उनमें बहुत बदलाव नहीं होता |  बस एक पर्दा जैसा होता है जो बाहर से आवरण का काम करता है | उस आवरण के अंदर झांकने की जुर्रत करिये तो कई सच बेपर्दा होते हैं | अभी हाल ही में  टेलीविजन में अलज़जीरा चैनल पर बंगलादेश की उस स्त्री का साक्षत्कार देख रहा था जो १९७१ में सेना के जवानों द्वारा कई दिनों तक लगातार किये गए बलात्कार के लिए न्याय की लड़ाई लड़ रही है | जितने साल हो गए बंगलादेश को अलग राष्ट्र बने उतने साल उसे लड़ते बीत गए पर अभी तक उसे न्याय नहीं मिला | हमारे अपने देश में शर्मीला इरोम के साथ क्या हो रहा है ? आपको यह जानकर आश्चर्य हो सकता है कि योरोप के मुहाने पर लगे तुर्की गणतंत्र में भी स्त्री की हालत बहुत अच्छी नहीं है | किसी देश के सामाजिक ताने-बाने को समझने में सामाजिक-सांस्कृतिक स्थितियों एवं परिस्थितियों से संवाद एक महत्वपूर्ण जरिया होता है | इस संवाद की जड़ें परिवार और परिवार की धुरी स्त्री  के प्रति किसी समाज का व्यवहार कैसा है, उनमें गहरे धँसी होती हैं | तुर्की की सामाजिक-सांस्कृतिक रहन, सिद्धांत और व्यवहार में एक स्त्री की जगह और पहचान को लेकर बहुत गहरा विरोधाभास अंदर ही अंदर पसरा हुआ है |  
तुर्की एक ‘स्टेट’ के बतौर अपने गणतंत्र के नव्बे वर्ष पूरे करने जा रहा है | वह मध्य-पूर्व का एक मजबूत राष्ट्र है | विश्व की बीस बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक | अपने ढंग का इकलौता लोकतांत्रिक और सेकुलर कहा जाने वाला इस्लामिक राष्ट्र जिसकी नींव मुस्तफा कमाल अतातुर्क ने डाली थी | वह संयुक्त राष्ट्र संघ (UN), आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (OSCE), उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (NATO) और इस्लामिक सहकारी संघ (OIC) का सदस्य है | योरोपीय संघ (EU) की सदस्यता के लिए निरंतर कोशिशों में लगा हुआ है इसके लिए वह योरोपीय संघ द्वारा दिए हुए ‘कोपेनहेगन मानकों’ को पूरा करने में लगा हुआ है | अन्य इस्लामिक राष्ट्रों के लिए तुर्की को बतौर एक माडल के रूप में प्रोजेक्ट करने की कोशिश योरोपीय देशों की ओर से हो रही है | पर यही शायद तुर्की के अपने आंतरिक द्वंद्व का कारण भी है | वह इस्लामिक राष्ट्रों का अगुआ भी बनना चाहता है और योरोपीय संघ की सदस्यता के लिए भी कई सालों से कोशिश में लगा है | स्वाभाविक है कि दोनों की अपनी–अपनी मांगे हैं अपने-अपने तर्क हैं | एक तरफ काबा है तो दूसरी तरफ कलीसा है | ‘इमां मुझे रोके है तो खेंचे है मुझे कुफ्र/ काबा मिरे आगे है तो कलीसा मिरे पीछे |’ असल परेशानी तुर्की की यही है | इसलिए परदे के भीतर की आंतरिक सचाईयों को देखा जाय तो तुर्की अपनी धार्मिक और सामाजिक, राजनितिक और आर्थिक स्थितियों में एक खास तरह की एम्बिग्युटी और पैराडाक्स को जीने वाला राष्ट्र है | यह दुचित्तापन, यह विरोधाभास पूरब और पश्चिम के मध्य, इस्लामिक-राष्ट्रों और योरोपीय-राष्ट्रों के बीच, पारंपरिक इस्लामिक रहन और आधुनिक पाश्चात्य खुलेपन के बीच संतुलन बनाने की लगातार की जाने वाली उसकी नीतियों और व्यवहारों में देखा जा सकता है |
योरोपीय मानकों के हिसाब से तुर्की मानवाधिकार के मामले में सबसे फिसड्डी है | इसमें स्त्रियों की स्वतंत्रा और अधिकार सबसे प्राथमिक मुद्दे हैं | बाहरी दिखावे के लिए तो स्त्री के प्रति बहुत सम्मान है | उसको बहुत कुछ अधिकार मिले भी हुए हैं | मैं तुर्की की राजधानी अंकारा में रहता हूँ | विश्वविद्यालय जाने के लिए सामान्यतः बस की सेवा लेता हूँ जो आम जनता की सवारी है | स्त्री-पुरुष सब की | पर किसी स्त्री को देह की नज़र से घूरते हुई किसी पुरुष को नहीं देखा | नयी पीढ़ी की स्त्रियों के पहनावे और वेश-भूषा में पाश्चात्य आधुनिकता देखने को मिलती है तो साथ ही एक पीढ़ी पहले की जो स्त्रियां हैं उनमे ओटोमन जमाने के इस्लामिक संस्कार देखने को मिल जाएंगे | वे बुर्का तो नहीं पहनतीं पर सिर को दुपट्टेनुमा खास डिजाईन वाले एक तरह के कपड़े से ढंकती हैं | तो, एक साथ आपको आधुनिक और पारंपरिक दोनों पहनावे दिख जाएंगे | लड़कियों पर राह चलते छींटाकशी यहाँ अंकारा में मैंने नहीं देखी सुनी | हो सकता हो देश के दूसरे शहरों में यह हो | क्योंकि हमारे एक पी-एच. डी. छात्र याल्चिन कायली का कहना है कि अंकारा में राजधानी होने के नाते यह नहीं है | तो, क्या सच में जो दीखता है वही सच नहीं होता ? जब धीरे-धीरे दूसरे छोर से मैं देखने और समझने की कोशिश करने लगा तो स्थिति बहुत ही निराशाजनक है | तुर्की समाज में बाल-विवाह, घरेलू-हिंसा का प्रतिशत बहुत अधिक है | राजनितिक और सामजिक मंचों पर स्त्रियों की भागीदारी न के बराबर है | घर के अंदर पुरुष उसे ‘कमोडिटी’ से अधिक कुछ नहीं समझता |
तुर्की में बाल-विवाह की जो जड़ें हैं वह यहाँ के गावों में बहुत गहरे तक फ़ैली हुई हैं | इसके पीछे पारम्परिक इस्लाम की धार्मिक मान्यताओं का रोब-दाब बहुत अधिक है | एक स्त्री की कुल सच्चाई यह है की जब से आर्गेनिक ढंग से वह संतान उत्पन्न करने के लायक हो जाय और जब तक इस लायक बनी रहे उसे अधिक से अधिक संतान उत्पन्न करना चाहिए | इस दुनिया में वह पैदा ही इसीलिए हुयी है | जो आंकड़े हैं उनके अनुसार १५ साल में ही पढ़ाई छुडाकर व्याह दी जाने वाली लड़कियों का प्रतिशत कुल आबादी का ६१ प्रतिशत है | अभी हाल ही में ‘पेव रिसर्च फाउन्डेशन’ ने धर्म के सम्बन्ध में वैश्विक आंकड़े जारी किए हैं | २३८ देशो में किये गए इस सर्वेक्षण से जो परिणाम आये हैं उनमें से एक यह है कि दुनिया में पूरी आबादी का ८४ प्रतिशत धर्म और उसके संस्थानों और रीतियों-नीतियों से सम्बन्ध रखने वाली आबादी है | यह हम सब बखूबी जानते हैं कि धर्म और उसकी संस्थानिक सामाजिक सत्ता का सबसे कठोर दंड स्त्रियों को भोगना सहना पड़ता है | इस्लामिक राष्ट्रों में यह और अधिक है |
तुर्की में घरेलू हिंसा के आंकड़े और भयावह हैं | जो पुरुष घर के बाहर आपको बहुत ही उदार और सभ्य दिखेगा वही घर में अपनी मर्दानगी में स्त्री के साथ तरह-तरह की क्रूरताएं करने से बाज नहीं आता है | यहाँ के सामजिक संगठनो और सोशल मिडिया के लिए यह केन्द्रीय समस्या है | ‘ढोल गंवार शूद्र पशु नारी/सकल ताडना के अधिकारी’ की तरह यहाँ भी लोक-व्यवहार में यह  प्रचलित है कि, ‘एक औरत के पिछले हिस्से पर हमेशा डंडा पड़ते रहना चाहिए तभी वह काबू में रहती है |’ इसपर भी धर्म और समाज का ऐसा आतंककारी भय कि पीड़ित – प्रताडित औरत इसको जब्त करती जाती है – घर की इज्जत के नाम पर | लन्दन में रहने वाली तुर्की की लेखक एलीफ़ सफक का एक उपन्यास है ‘इस्केंदर’ (सिकंदर), पिछले वर्ष अंगरेजी में यह उपन्यास ‘ऑनर’ के नाम से छप कर आया है | इस उपन्यास में सफक ने घर के अंदर एक स्त्री की निर्मम दुनिया को जिस तरह से लिखा है वह शर्मशार कर देने वाला है | घरेलू-हिंसा से पीड़ित और घर से निकाली या स्वतः घर छोड़कर निकल गयी औरतें अपने बच्चों के साथ सरकार द्वारा बनाये गए शेल्टरों में जीवन गुजार रही हैं | तुर्की में ऐसे ८६ शेल्टर्स हैं जिनमें ग्यारह हज्जार औरतें २३३८ बच्चों के साथ रह रही हैं | अंगरेजी दैनिक ‘ टुडेज जमन’ का कहना है कि २०११ की तुलना में २०१२ में यह संख्या बढ़ी है | परिवार एवं सामाजिक मामलों की मंत्री फातिमा शाहीन का कहना है कि ऐसे शेल्टर्स की संख्या और बढ़ाई जा रही है | यह तो वह औरतें हैं जिन्होंने घरेलू हिंसा के खिलाफ शिकायत करने का साहस किया, जिन्होंने यह मान कि जिसे घर कहा जाता है वह एक स्त्री के लिए नर्क से भी बदतर है | यहाँ बाहचेशहर विश्विद्यालय में सामाजिक-राजनीतिशास्त्र की प्रोफ़ेसर निलोफर नार्लि का कहना है कि, घरेलू हिंसा से पिडीत औरतों में से ५५ प्रतिशत औरतें यह कहते हुए पायी जाती हैं कि ‘वह मेरा शौहर है, वह मुझे मारता भी है तो प्यार भी तो करता है |’ निलोफर पिछले पांच वर्षों में शारीरिक और यौन हिंसा की शिकार मृत औरतों का जो आंकड़ा देती हैं वह लगभग १७०० के आसपास है | अभी इसी माह के ३ दिसंबर की एकदम ताज़ा घटना है यहाँ काला सागर के किनारे बसे एक प्रमुख महानगर इज़मीर की | पिनार उय्नलुर नाम की एक २९ वर्षीय महिला की उसके अपने ही पुरुष मित्र द्वारा गोली मरकर हत्या कर दी गयी | वह अपने ९ साल के बच्चे को स्कूल लेने गयी थी | बच्चे को लेकर स्कूल से ज्यों ही वह बाहर निकली उसकी कनपटी से सटाकर गोली मारी गयी, तत्क्षण उसकी मृत्यु हो गयी | बच्चा किस दहशत में होगा इसकी कल्पना आप हम कर सकते हैं | और तो और राजनितिक मंच पर सक्रिय भागीदारी और रसूख रखने वाली औरतें भी इस घरेलू हिंसा का शिकार हैं | वर्तमान में सत्ता पर काबिज तुर्की की ‘जस्टिस एंड डेवेलपमेंट पार्टी’ की संसदीय उप-प्रमुख फातिमा सलमान कोतान तक घरेलू हिंसा की शिकार हैं | पिछले दिनों यहाँ के एक अंगरेजी अखबार को दिए अपने साक्षात्कार में उन्होंने इसे स्वीकार किया | तुर्की के टेलीविजन चैनल अपने धारावाहिको में जो पारिवारिक ‘ड्रामा’ और ‘कामेडी’ परोसते हैं उनमें एक स्त्री को हर जगह पुरुष मर्दानगी में अपमानित और प्रताड़ित होते दिखाया जाता है | वह ऐसे पेश की जाती है कि पुरुष के अधीन रहना उसकी नियति है | हाल ही में दिखाए जा रहे एक ‘सोप ओपेरा’ को लेकर काफी विवाद हुआ | अभी वह विवाद चल ही रहा है | आटोमन ज़माने के इतिहास को आधार बनाकर ‘मुहेत्शिम युजयिल’ (मैग्निफिसेंट सेंचुरी) नामक इस सोप ओपेरा में आटोमन सुलतान सुलेमान के हरम के माध्यम से स्त्रियों की जो छवि निर्मित की जा रही है वह एक ‘सोशल स्टेट’ के खिलाफ है | ऐसे ही एक अन्य धारावाहिक ‘फातमा ग्युलू’न सुचु ने’ (व्हाट इज फातमा गुल’स आफेंस)  के विरूद्ध यहाँ के सामजिक संगठनों ने आवाज उठाई है | इन धारावाहिकों में स्त्री या तो केवल सेक्स आब्जेक्ट होती है या मातृत्व में विवश और मजबूर औरत | तमाम नारीवादी सामाजिक संगठनों के विरोध के बाद संस्कृति मंत्रालय ने जनमत जानने के लिए एक सर्वेक्षण कराया जिसमें ७० प्रतिशत जनता के मत में ये धारावाहिक स्त्री की छवि को बिगाड़ने वाले हैं |
स्त्रियों की लड़ाई लड़ने वाला यहाँ का प्रमुख संगठन है – ‘दि एसोशियेसन फार एडुकेशन एंड सपोर्टिंग फिमेल केंडिडेट्स’ (KA-DER) | यह संगठन स्त्री को सभी मंचों पर समान अधिकार दिए जाने की लड़ाई लड़ रहा है | आपको आश्चर्य होगा कि यहाँ की २७५ संसदीय सीट वाली सरकार में केवल एकमात्र महिला मंत्री फातिमा शाहीन हैं जो परिवार और सामजिक मामलों का मंत्रालय संभालती हैं | तुर्की गणतंत्र के इतिहास में अबतक यहाँ एकमात्र महिला तान्सु पेंबे चिलेर प्रधानमंत्री हुयी हैं |  पर स्त्री अधिकारों के लिए काम करने वाले कार्यकताओं का कहना है कि उस महिला ने अपनी ही स्त्री जाति के लिये कोई काम नहीं किया | कुछ का तो यहाँ तक कहना है कि राजनीति में जिस तरह का पुरुष वर्चस्व है उसको देखते हुए यह कहा जा सकता है कि तान्सु पहली और आखिरी महिला प्रधानमंत्री थीं | उनको एक मौका मिला था, अपनी राजनितिक शक्ति और अधिकार का उपयोग कर स्त्रियों के लिए कुछ करने का पर उन्होंने इसके लिए कोई प्रयास तक नहीं किया | सामाजिक संगठनों की लगातार यह मांग है कि तुर्की स्त्री अधिकारों के प्रति जरूरी कदम उठाये | स्त्रियों के प्रति जो अत्याचार हैं और उनके लिए जो जरूरी क़ानून हैं, मसलन घरेलू हिंसा के रोकथाम के लिए क़ानून की धारा ६२४८, सिविल कोड २००२ और पेनल कोड २००४ सब नाकाफी हैं | क्योंकि ये क़ानून स्त्री अधिकारों की बात नहीं करते वरन परिवार की सुरक्षा और उन्हें बचाने की वकालत करते हैं | निलोफर नार्लि का मानना है कि, परिवार के समर्थन और सुरक्षा से अधिक स्त्री की सुरक्षा जरूरी है | ‘का-देर’ की मांग है कि, ‘हमें प्रशासनिक स्तर पर, राजनितिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक सभी क्षेत्रों में पुरुषों के बराबर प्रतिनधित्व और अधिकार चाहिए | हम कोटा सिस्टम में विश्वास नहीं करते | क्योंकि कोटा सिस्टम में बराबर का अधिकार सुनिश्चित नहीं होता | इसके लिए उनकी मांग है कि ‘जिप्पर सिस्टम’ लागू किया जाय | ‘जिप्पर सिस्टम’ पर आगे के अंकों में किसी कालम में विस्तार से चर्चा की जायेगी |
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इस शीर्षक का विम्ब और अर्थ ध्वनि (अर्थ-छवि भी) कात्यायनी की एक कविता ‘निराशा की कविता’ की एक पंक्ति से प्रभावित है | ‘जानती हूँ कि समय के सिरे खुले हुए हैं’ इस पंक्ति की निरपेक्ष सचाई कही न कही मेरी संवेदनात्मक दुनिया में गहरे धंसा रह गयी थी जिसकी टीस बराबर बनी रही |